जिस प्रकार पृथ्वी पर पड़ा हुआ एक तुच्छ तृण पूर्णतः पवन के वेग पर आश्रित होता है—वायु उसे जिस दिशा में उड़ाकर ले जाती है, उसे विवश होकर वहीं जाना पड़ता है...