ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
22 itemsज्यौंही-ज्यौंही तुम राखत हौ
हे हरि! आप जैसे-जैसे मुझे रखते हैं, वैसे-वैसे ही मैं रहता हूँ। [1] आपकी इच्छा के बिना मैं एक पग भी आगे नहीं बढ़ा सकता; फिर विशेष कर्तव्य (भगवद्-प्रा...
लोग तो भूलैं भलैं भूलैं
इस पद में स्वामी श्रीहरिदासजी अपने आश्रित भक्तों के प्रति स्नेह से भरे हुए कहते हैं कि, “हे मेरे प्रिय भक्तों! सामान्य लोग तो श्रीबिहारीजी के अनन्य आश...
झूठी बात सांची करि दिखावत
प्रस्तुत पद में श्रीहरिदासजी जीव की अति प्रबल संसार-आसक्ति को देखकर श्रीबिहारीजी से कहते हैं कि आप ऐसे नागर नटवर-शिरोमणि हो जो कि इस मिथ्या (झूठे) माय...
प्रेम समुद्र रूप रस गहरे
प्रेम और रूप के अगाध महासागर (अर्थात "श्री बिहारी जी") की गहराई को नापना सर्वदा असंभव है ।
कबहूँ-कबहूँ मन इत-उत जात, यातैंब कौन अधिक सुख
निज आश्रित जन से स्वामी श्री हरिदास जी कहते हैं, “हे भाई! कभी तुम्हारा मन मायिक सुखों में डूब जाता है, तो कभी परमार्थ के सुखों में। तुम्हें यह विचार क...
ऐ हरी मो सौ न बिगारन कौ
श्री हरिदास जी महाराज कहते हैं, “एक ओर हम जीव हैं, जिन्हें अपनी बिगाड़ने की आदत लगी हुई है, और दूसरी ओर अकारण करुणा के सागर, श्री बिहारी जी हैं, जो सद...
संसार समुद्र मनुष्य मीन
यह संसार एक अथाह सागर के समान है, जिसमें यह मनुष्य-रूपी मीन (मछली) काल के क्रूर घड़ियालों और मगरमच्छों जैसे हिंसक विषयों से घिरी हुई है, जो उसे प्रतिपल...
मन लगाय प्रीति कीजै, कर करवा
स्वामी श्रीहरिदासजी नित्य-विहार के उपासकों को यह आज्ञा देते हैं कि अपने मन को एकाग्र कर श्रीश्यामा-कुंजबिहारी से प्रेम करो। ब्रज की रज-निर्मित करुवा स...
हित तौ कीजै कमलनैन सौं
हित तौ कीजै कमलनैन सौं, जा हित के आगैं और हित लागै फ़ीकौ । कै हित कीजै साधु-संगति सौं, ज्यौं कलमष जाय सब जी कौ । । - ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्...
काहू कौ बस नाहिं, तुम्हारी कृपा तें सब होय बिहारी-बिहारिनि
हे बिहारी बिहारिणी! सुर-मुनि मोहिनी आपकी दुर्जय माया की प्रबलता ऐसी है कि किसी का भी बल नहीं है जो अपने साधन-प्रयत्न से आपकी माया से पार हो सके। जो कु...
देखौ इनि लोगन की लावनि
स्वामी हरिदासजी कहते हैं कि इन संसारी जीवों की विचित्र प्रीति (लावनि) तो देखो! ये साक्षात् आनंद-निधि श्रीबिहारीजी की भक्ति का परित्याग कर, मिथ्या और क...
जगत प्रीति करि देखी
प्रस्तुत पद में स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज संसार की नश्वरता और यहाँ के स्वार्थपरक अनुराग का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण करते हैं। वे कहते हैं कि इस जगत मे...
प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाट
जिस प्रकार समुद्र की अगाधता का कोई ओर-छोर नहीं है, उसी प्रकार प्रेम-सागर, जिसमें केवल रूप और रस की गहराई है, उसका ओर-छोर कोई कैसे पा सकता है? कोई भी ...
हरि के नाम कों आलस कत करत है रे
अरे अज्ञानी जीव! तू श्रीहरि-नाम रूपी धन का संग्रह करने में प्रमाद (आलस) क्यों करता है? देख, साक्षात् काल तुझे अपना ग्रास बनाने हेतु धनुष पर बाण संधान ...
हरि कौ ऐसोई सब खेल
इस मायिक जगत में श्रीहरि की लीला अत्यंत विलक्षण है, जहाँ वास्तविक सुख का न तो कोई बीज है और न ही कोई लता। जीव नश्वर पदार्थों से सुख पाने की आशा में वै...
जौलौं जीवै तौलौं हरि भज रे मन और बात सब बादि
इस पद में स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज समस्त जीवों को उपदेश देते हुए कहते हैं, “हे भाई! जब तक तू इस जगत में जीवित है, सब प्रकार के सांसारिक झंझटों को त्...
बंदे, अखतियार भला
परम रसिक स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज कहते हैं, “हे जीव! तुझे यह अनमोल मानव-देह अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य से प्राप्त हुआ है। अब अपने चित्त को संसार के व्यर्...
झूठी बात सांची करि दिखावत
प्रस्तुत पद में श्री हरिदास जी जीव की अति प्रबल संसार आसक्ति को देखकर श्री बिहारी जी से कहते हैं कि आप ऐसे नागर नटवर शिरोमणि हो जो कि इस मिथ्या (झूठे)...
हरि के नाम कों आलस कत करत है रे
हरि नाम जप में आलास क्यों करते हो, काल तुम्हें ले जाने के लिए धनुष पर बाण चढ़ाये फिर रहा है। [1] वह न तो शुभ समय को जानता है न तो अशुभ समय को, वह तुम्ह...
हित तौ कीजै कमलनैन सौं
कमल के समान नेत्र हैं जिनके, ऐसे कमल नयन श्री बिहारीजी से ही हित -प्रेम करना चाहिए क्यूंकि उसके आगे सांसारिक एवं मोक्ष तक की कामना तुच्छ लगती है या सा...
हरि कौ ऐसोई सब खेल
मायिक जगत में श्री हरि का ऐसा ही विचित्र खेल है, जिसमें सुख का न कोई बीज है और न ही बेल। इसी वजह से समस्त व्यक्ति सांसारिक पदार्थों की आशाओं से सुखी ह...
ऐ हरी मो सौ न बिगारन कौ
एक हम जीव हैं जिन को हमेशा सभी काम बिगड़ने की आदत पड़ी हुई है और दूसरी तरफ अति अकारण करुणा वरुणालय करुणामय बिहारी जी जो हमारा काम बनाने में ही लगे रहते ...