“ नमो नमो श्री वृन्दावनचंद, नित्य अनंत अनादि एक रस, पिय प्यारी विहरत स्वछंद । ” - श्री भगवद रसिक, भगवद रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्...