ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
9 itemsतट-भुवि कृत-कान्तिः
यमुना के तट पर स्थित होने से ब्रज मंडल के वनों की शोभा और भी बढ़ जाती है, जहाँ भिनभिनाती मधुमक्षिकायें अनंत मधुरता से अलंकृत नव कदम्ब के वृक्षों का आश...
कदाहं यमुना-तीरे नामानि तव कीर्तयन्
हे कमल नेत्रों वाले भगवान कृष्ण, ऐसा कब होगा कि मैं वृंदावन में यमुना किनारे आपका कीर्तन गाते हुए आखों में आँसु भरकर नृत्य करूँगा?
भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते
जब तक भोग या मुक्ति की पिशाची इच्छा हृदय में विद्यमान है, तब तक भक्ति रस का उदय कैसे हो सकता है?
भक्ति के क्रमिक विकास का वर्णन
आदौ श्रद्धा ततः साधुसंगोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात्तत्तो निष्ठा रुचिस्ततः॥ अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाऽभ्युदञ्चति। साधकानामयं प्रेम्णः प...
अन्येषु पुण्य-तीर्थेषु
अन्य स्थानों एवं धामों में मुक्ति ही सबसे बड़ा फल माना गया है जिसे वहाँ प्राप्त भी किया जा सकता है, परंतु भगवान की भक्ति, जो मुक्तों द्वारा भी वांछित ...
मथुरां च परित्यज्य
जो मूर्ख व्यक्ति मथुरा [ब्रज मंडल] को त्यागकर किसी अन्य स्थान से मोहित हो जाता है मानो वह मेरी माया से मोहित होकर जन्म-जन्मान्तर इसी संसार में भटकता र...
स्मेरां भङ्गी-त्रय-परिचितां
हे मेरे मित्र, यदि आप अपने मित्रों और रिश्तेदारों के साथ ही सुख और चैन से रहना चाहते हैं, तो श्री कृष्ण के उस रूप को कदापि न देखें जो वृंदावन में यमुन...
अहो मधु-पुरी धन्या
ऐसा कौन सा बुद्धिमान व्यक्ति है जो ब्रज मंडल की शरण नहीं लेगा जिस धाम को वैकुंठ धाम से भी अधिक श्रेष्ठ माना गया है, जहां केवल एक दिन भी भाव से रहने से...
भक्ति के क्रमिक विकास का वर्णन
भक्तिरसामृत सिन्धु में श्रील रूपगोस्वामी, भक्ति के क्रमिक विकास का वर्णन करते हुए कहते हैं कि:- आदौ श्रद्धा ततः साधुसंगोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्ति...