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भाव प्रेम अरु नेम है
भाव ही प्रेम और नियम है एवं भाव ही साधन का सार है। श्री रूपमधुरी जी कहते हैं कि भाव के बिना जीव संसार में ही बार बार भटकता रहता है।
shloka
भाव अनोखी वस्तु है जो कर जाने कोय
‘भाव’ अर्थात आंतरिक भावना एक विलक्षण तत्व है, जिसका वास्तविक मर्म कोई विरला व्यक्ति ही अनुभूति द्वारा जान पाता है। श्री रूपमाधुरी जी कहते हैं कि संसार...