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ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
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आनँद के घन छैल सों करि ले चित को चाव
हे मन! उन आनंद के पुंज, परम रसीले छैल (श्री कृष्ण) से अपने चित्त का चाव (अनुराग) लगा ले। यदि तू प्रेम की वह दिव्य बेल चाहता है जो कभी कुम्हलाती नहीं, ...
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इस्कलता ब्रजचंद की जो बाँचै दै चित्त
जिसको ब्रजचन्द्र श्री कृष्ण के दिव्य प्रेम की चाह हो तो वे अपने मन का अनुराग सुख के धाम श्री वृंदावन से करे और नित्त ही नित्त प्रेम की लहरों में डूबा ...