सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
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ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

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जुगल रूप ऐसो चितैं

प्रेम से रोमांचित होकर, अपने तन की सुधि भूलकर, युगल-रूप का ऐसा चिंतन कीजिए जिसमें वे नूपुरों की झंकार करते हुए यमुना-किनारे विहार कर रहे हों।

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जो मन अरुझ्यो रूप हैं क्यों हू कहत बनैं न

श्यामा-श्याम के अनुपम रूप-सौंदर्य में अटके हुए मन की दशा को शब्दों में व्यक्त करना असंभव है, क्योंकि जीभ के पास वह मन नहीं है, और मन के पास वह जीभ नही...

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कब श्री वृन्दावन धरनि

श्री वृन्दावन धाम की पवित्र भूमि पर चरण रखने का अवसर मुझे कब प्राप्त होगा? मैं उस रज में लोट जाऊँगा, कुछ अपने सिर पर धरूँगा और कुछ मुख में धारण करूँगा...

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कबै झुकत मो ओर कौं

ऐसा कब होगा जब श्री प्रिया-लाल वृन्दावन में यमुना-तट पर लता-पत्तों के मध्य विहार करते हुए, एक-दूसरे को गलबहियाँ दिए, एक-दूसरे की ओर झुके हुए, अलमस्त ग...