सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठग्रन्थमथुरा महात्म
सभी ग्रन्थ
Sacred Scripture

मथुरा महात्म

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

12 items
general

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च माथुरं लभते फलम्

जो ब्रज में स्नान, यहाँ का निर्मल जन पान करते हैं वह उत्तम फल प्राप्त करते हैं। यहाँ प्राण त्यागने से मेरे लोक की प्राप्ति होती है।

general

वृन्दावनं च गोविन्दं ये

वृन्दावनं च गोविन्दं ये पश्यन्ति वसुन्धरे। न ते यमपुरं यान्ति यान्ति पुण्यकृतां गतिम्॥ - वराहपुराण, मथुरा महात्म (153.49) हे वसुधे, वृंदावन भ्रमण तथ...

general

प्रदक्षिणीकृतो येन मथुरायां

प्रदक्षिणीकृतो येन मथुरायां तु केशवः। प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा॥ - वराहपुराण, मथुरा महात्म (158.8) जिसने केशव नगरी मथुरा [ब्रज] की परिक...

general

मथुरायाः परं क्षेत्रं त्रैलोक्ये न च विद्यते

मथुरायाः परं क्षेत्रं त्रैलोक्ये न च विद्यते। तस्यां वसाम्यहं देवि मथुरायां च सर्वदा॥ - वराहपुराण, मथुरा महात्म (169.1) भगवान कहते हैं: मथुरा [ब्रज...

general

सर्वेषामेव तीर्थानां मथुरा च परं महत्

सर्वेषामेव तीर्थानां मथुरा च परं महत्। कृष्णेन क्रीडितं तत्र तच्छुद्धं हि पदे पदे॥ - वराहपुराण, मथुरा महात्म (169.2) समस्त तीर्थों में मथुरा (ब्रज म...

general

मथुरायां ये वसन्ति विष्णुरूपा हि ते नराः

ब्रज वासी भगवान [विष्णु] के ही रूप हैं, केवल ज्ञानी जन ही उनका दर्शन कर सकते हैं, अज्ञानी नहीं।

general

चतुर्वेदं परित्यज्य माथुरं पूजयेत्सदा

चतुर्वेदं परित्यज्य माथुरं पूजयेत्सदा। सिद्धाभूतगणाः सर्वे ये च देवगणा भुवि॥ - वराहपुराण, मथुरा महात्म (165.66) चारों वेदों के ज्ञाता को छोड़ कर बृज...

general

सप्तद्वीपे च तीर्थानां

सातों द्वीपों में स्थित तीर्थों का भ्रमण करने से जो फल प्राप्त होता है, उससे अधिक फल, मथुरा (ब्रज मंडल) भ्रमण से ही प्राप्त हो जाता है।

general

उत्तरे हरिदेवस्य दक्षिणे कालियस्य तु

उत्तरे हरिदेवस्य दक्षिणे कालियस्य तु। अनयोर्देवयोर्मध्ये ये मृतास्तेऽपुनर्भवाः॥ - वराहपुराण, मथुरा महात्म (156.18) जहां उतर में श्री कृष्ण दक्षिण मे...

general

अन्यदेशागतो दूरात्परिभ्रमति यो नरः

अन्यदेशागतो दूरात्परिभ्रमति यो नरः। तस्य सन्दर्शनादन्ये पूताः स्युर्विगतामयाः॥ श्रुतं यैश्च विदूरस्थैः कृतयात्रं नरं नरैः। सर्वपापविनिर्मुक्तास्ते यान...

general

ये वसंति महाभागे मथुरामितरे जनाः

हे पृथिवी! जो भाग्यशाली जन ब्रज मंडल में निवास करते हैं वे मेरे कृपा प्रसाद से परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं।

general

अपि कीटः पतंगो वा तिर्यग्योनिगतोऽपि वा

मथुरा (ब्रज मण्डल) में जो मृत्यु को प्राप्त करता है वह चाहे कीड़ा-मकौड़ा क्यों न हो, वह भी भगवद् स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।