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Sacred Scripture

मतिराम सतसई

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

10 items
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राधा मोहन-लाल को, जाहि न भावत नेह

जिनको राधा और कृष्ण का विशुद्ध प्रेम रुचिकर नहीं है, उनकी आँखों में दस हज़ार मुट्ठी धूल पड़ जाए। भाव यह है कि जो राधा-कृष्ण के प्रेम को साधारण समझते ह...

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पगीं प्रेम नंदलाल कैं, हमैं न भावत जोग

गोपियाँ उद्धव से कहती हैं—हे भ्रमर! हम तो श्री कृष्ण के प्रेम में निमग्न हैं, इसलिए तुम्हारी योग-ज्ञान (निरगुण) की बातें हमें अच्छी नहीं लगतीं। जब राज...

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मुंज गुंज के हार उर, मुकुट मोर पर-पुंज

हृदय पर गुंजाओं की माला धारण किए हुए, मस्तक पर मोर-पंखों से सुशोभित मुकुट पहने हुए कुंज-बिहारी—कुंजों में विहार करने वाले हे श्रीकृष्ण! आप मेरे मनरूपी...

dham

अधम अजामिल आदि जे, हौं तिनकौ हौं राउ

अजामिल जैसे जितने भी अधम और महापापी हुए हैं, मैं उन सबका शिरोमणि हूँ अर्थात् मैं उन सबसे बड़ा अपराधी हूँ। हे श्री कृष्ण! अब मुझ पर भी अपनी करुणा कीजिए...

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मो मन तम-तोमहि हरो राधा को मुख चंद

श्री राधा का परम उज्ज्वल मुखचंद्र मेरे हृदय के अंधकार का नाश करे। जिस प्रकार चंद्रमा के दर्शन से समुद्र में ज्वार उमड़ता है, उसी प्रकार श्री राधा के म...

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तेरी मुख समता करी

हे राधिके, तुम्हारे मुख-कमल की समता करना किसी के लिए संभव नहीं। कमल और चंद्रमा ने भी जब यह साहस किया, तो कमल पर पुष्प-रज की धूल बैठ गई और चंद्रमा को क...

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सुबरन बेलि तमाल सौं घन सौं दामिनी देह

जिस प्रकार सोने की बेल तमाल वृक्ष से और बादल के संग बिजली शोभित होती है, हे श्री राधे! उसी प्रकार सदृश स्नेह के कारण तुम घनश्याम संग सुशोभित रहती हो।

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कोटि-कोटि मतिराम कहि, जतन करौ सब कोइ

कोटि-कोटि मतिराम कहि, जतन करौ सब कोइ। फाटे मन अरु दूध में, नेह न कबहूँ होइ॥ - श्री मतिराम, मतिराम सतसई (70) श्री मतिराम जी कहते हैं कि चाहे कोई करो...

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छाँड़ि नेह नंदलाल कौ हम नहिं चाहत जोग

एक गोपी कहती है, “नंदलाल श्री कृष्ण के निष्काम प्रेम को त्याग कर हम योग नहीं चाहती। जो रत्न के पारखी होते हैं, भला वे रंग बाती (शरीर में लगाई जाने वाल...

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ब्रज ठकुरानी राधिका, ठाकुर किए प्रकास

ब्रज की ठकुरानी केवल श्री राधा महारानी हैं। उन्हीं की कृपा से श्री कृष्ण का यश जगत में प्रकाशित है। जो श्री हरि सबके मन को मोहने वाले हैं, वे यहाँ ब्र...