ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
11 itemsकोउ सुकिया, कोउ परकिया, कलपि किये मत बादि
किसी ने स्वकीया आरै परकीया (नायिका) के रूप में श्री प्रिया जी की कल्पना करके एक व्यर्थ का बखेड़ा सा खड़ा कर दिया है।भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी प्...
जो उपदेसै और कौं, सो नहिं मानै आप
उपदेशक (पंडित, संत, महंत, गुसाईं, परमहंस आदि ) - दूसरों को जो शिक्षा देते हैं, उस पर स्वयं अमल नहीं करते। संसार की होशियारी (मूर्खता) तो देखिये कि यह ...
जो कछु लिख्यौ ललाट में, दुख सुख देही संग
भाग्य में जो कुछ दुःख सुख लिखा है वह इस शरीर के साथ जुड़ा है। तुम जहाँ कहीं भी जाओगे, वहीं वह भोगना पड़ेगा। यह सिद्धांत अटल है। [1] इसलिए हे प्राणी, ...
गेरा मासे कौ गुरू, ताकौ सिष सब कोय
जो ग्यारह मासे भर (शुद्ध चाँदी) का बना है (अर्थात् रूपया, धन) वही सारे संसार का गुरु है, सब उसी धन के चेले चपाटे हैं। [1] जो कुछ भी आराधना उपासना संस...
आँधे के सिर सम्प्रदा
आज कल जो संप्रदायवाद का नाटक चल रहा है उसके दृष्टांत को देखते हुए भगवत रसिक जी कहते हैं: एक समझदार एवं रसपरक भामिनी (पत्नी) अपने पति को प्रेमविहीन ए...
भगवत रसिक अनन्य
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि रसिक भक्त अपने इष्टदेव के प्रति अनन्य होता है, इसी कारण वह अद्भुत रस का आस्वादन करता है। श्यामाश्याम के नित्यबिहार रस मे...
माँछी, माँछ माँगने
साधारण साधक को वृन्दावन वास करने में मक्खी, मच्छर, भिखारी, चूहे, बंदर, चोर, काँटे, दीमक, जीविका और रहने के लिए स्थान की समस्या - ये दस घोर दुःख सताते ...
आसा जाकी जहँ बसी तहँ ताही कौ बास
गुहस्थ हो या विरक्त, स्वामी हो या सेवक, जिसका मन जहां आसक्त है बस वो उसके ही पास रहता है। [1] यदि कोई सांसारिक विषय में आसक्त है तो उस (संत, महात्मा,...
नाहीं द्वैताद्वैत हरि
श्री कृष्ण न तो द्वैताद्वैत सिद्धांत में बंधे हैं न विशिष्टाद्वैत में, वे तो परम स्वतंत्र हैं, अपनी इच्छा अनुसार ही कार्य करते हैं। [1] परम स्वतंत्र ...
श्री भगवत उर धारी
जो व्यक्ति श्री हरि को हृदय-स्थल में विराजमान कर उनकी सच्ची भक्ति करता है और मन को वश में रखकर गुरु की आज्ञा के अनुसार चलता है, उसे संसार की कोई वेदन...
कोउ सुकिया कोउ परकिया
किसी ने स्वकीया और परकीया (नायिका) के रूप में श्री प्रिया जी की कल्पना करके एक व्यर्थ का बखेड़ा सा खड़ा कर दिया है। भगवत रसिक जी कहते हैं कि हमारी प्र...