ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
12 itemsराधे नाम सुन्यौ जब स्याम
श्री श्यामसुंदर को “राधे" नाम इतना रुचिकर है कि जब श्री श्यामसुंदर के कर्ण में “राधे” नाम पड़ता है तो उनके अंग अंग में प्रगाढ़ पुलकावाली जागृत हो उठती...
प्यारी जू तुम्हीं हौ गति मेरी
हे प्यारी जु तुम ही मेरी गति हो। मैं तो तेरी जनम जनम की दासी हूँ, यदि मेरे द्वारा कोई अपराध [चूक] हो गए हों तो उसे क्षमा कर मेरे दुःख का हरण करिए। [1...
राधे प्यारी तें मोहन वस कीनौं
हे श्री राधे प्यारी! आपने तो श्याम सुंदर को नित्य ही अपने वश में कर रखा है। समस्त लोक जिनके वश में हैं वही श्यामसुन्दर भगवान श्री कृष्ण आपके आधीन हैं।...
मेरौ कछु वस नाहिन करुणामई
हे करुणामई श्री राधिका, मेरे बस में कुछ भी नहीं है। मैं तो अपनी सुधि बुधि भुला कर भ्रम में भटक रहा हूँ, एवं अपने कर्मों द्वारा आपके प्रतिकूल चल रहा हू...
कोंन तप कीनों नथ कैं मोती
श्री प्रिया जी (श्री राधा) के नथ के मोतियों ने ऐसी कौन सी तपस्या की है कि श्री राधा ने उन्हें अपने नथ का मोती बनाया है और वे नित्य ही अधर सुधा का आचमन...
श्यामा श्याम दोउ रंग भीनैं
श्यामा श्याम दोनों प्रेम के रंग में भींज कर निकुंज में कदंब के वृक्ष के नीचे एक दूसरे के गले में बाँहें डाले खड़े हैं। [1] श्री वृंदावन धाम में चारों...
स्वस्ति श्री वृंदावन सर्वोपर राजमांन
मंगलकारी श्री धाम वृंदावन सर्वोपरि विराजमान है जहां सकल सुख निधान प्रिया प्रियतम (श्री राधा कृष्ण) विराजमान हैं। [1] जहां महामृदुल कमल की सेज पर हर्ष...
जमुना कूल कदम की छंहियां
श्री वृंदावन धाम में यमुना के किनारे, कदंब वृक्ष की छाया में, दोनों लाड़ली लाल [श्री राधा कृष्ण] गलबहियां दिये बैठे हैं। [1] प्रेम में उन्मत्त होकर स...
अवकै तो करुणा कियैं बनैं वलि
हे स्वामिनी जू (श्री राधे)! अबकी बार तो आपकी कृपा मुझपर होनी बनती है। यह भवसागर अत्यंत विकराल एवं विपुल है, मैं तुम्हारी कृपा के बिना इस भँवर जाल रूपी...
कर लै दरपन स्यांम दिखावत
श्री श्यामसुंदर अपने कर-कमलों में दर्पण लिए हुए दिखा रहे हैं एवं श्री श्यामा जू उसमें देख-देख के अपने सिर पर सुशोभित मोती को संवार रही हैं। [1] सुंदर...
आज विराजत आलीरी नवल किसोर
हे सखी! आज नवल किशोर श्री श्यामा श्याम अद्भुत रूप से विराज रहे हैं। भोर में दोनों एक दूसरे को आलिंगन किए हुए, एक दूसरे की भुजाओं में भुजाएं डाले रसरंग...
तोसी न निहारी मैं
हे प्यारीजू (श्री राधा)! मैं शपथपूर्वक कहता हूँ कि तुम्हारे समान रूप, गुण और चतुरता से युक्त कोई भी मैंने आज तक नहीं देखी। अपने ही प्राणप्रीतम से इस प...