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ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
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प्रात: स्मरामि युग-केलिरसाभिषिक्तं
नित्यनिकुञ्जबिहारी युगलकिशोर श्री राधा कृष्ण के परम दिव्य लीलाविहार केलि रस से अभिषिक्त तथा कलिन्दतनया श्रीयमुना के गम्भीर धारा प्रवाह से सर्वदा समन्व...
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प्रातर्नमामि वृषभानुसुतापदाब्जं
भम्रर रूपी व्रजगोपियों के नेत्र समूह जिनकी स्तुति करते हैं और परम चतुर प्रेमाकुल नन्दनन्दन श्रीहरि जिनकी सदा वन्दना करते हैं, ऐसे श्रीवृषभानुसता श्री ...
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प्रातर्धरामि हृदयेन हृदीक्षणीयं
व्रजसुन्दरियों (की अनन्य प्रीतिके कारण उन) — के प्राप्यरूप तथा उनके द्वारा प्रभातवेला में जगाये जाते हुए, सभी प्रकार की वेष-रचनाओं से समन्वित हुए जो च...