ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
8 itemsमनेर स्मरण प्राण
मन से स्मरण करना ही प्राण है। अत: मधुराति मधुर रस धाम श्री युगल विलास का स्मरण करना चाहिए क्यूँकि यही सर्व श्रुतियों का सार है। इनका स्मरण करना ही साध...
राधिका-चरणरेणु, भूषण करिया तनु
हे भाई! श्रीराधिका की चरणरेणु को तू अपने शरीर का भूषण कर, तब तो बिना किसी श्रम के तुम्हें श्रीकृष्ण गिरिधारी मिल जायेंगे। जो व्यक्ति श्रीराधा-चरण का आ...
पृथक आवास योग, दुखमय विषय भोग
व्रजमण्डल को छोड़कर जो अन्यत्र वास है, वह विषय भोग की तरह दुखमय है। व्रजवास तो श्रीगोविन्द-सेवन ही है, क्योंकि व्रजवासियों के साथ प्रतिक्षण श्रीकृष्णक...
गोविन्द शरीर सत्य ताहार सेवक नित्य
श्रीगोविन्द का श्रीविग्रह नित्य है एवं उनके सेवक भी नित्य है। श्रीवृन्दावन भूमि अलौकिक तेजोमय है। त्रिभुवन में श्रीवृन्दावन के समान शोभा का सार स्थान ...
तार भक्तसंगे सदा
श्रीराधिका के भक्तों का जो सदा संग करता है, मधुररस लीला की प्रेममयी कथा का जो श्रवण करता है, वह निश्चय ही श्रीघनश्याम को प्राप्त करता है। जो श्रीराधा ...
नरोत्तमदासे कय, एइ जेन मोर हये
श्री नरोत्तम दास कहते हैं - मैं बस यही कहता हूँ कि व्रज में मेरा अनुरागमय वास हो। सखीगण की दासी होने के नाते श्रीप्रिया प्रीतम भी मुझे अपनी दासी मान ल...
युगल चरण सेवा, युगल चरण ध्येवा
श्री युगल किशोर की चरण सेवा, युगल चरणों का ध्यान, युगल किशोर की काम रति के समान रूप माधुर्य, एवं उनकी दिव्य लीलाएँ, बस यही मेरे मन में स्मृति बनी रहे।
जय जय राधा-नाम, वृन्दावन जार धाम
श्रीश्रीराधानाम की जय हो, जय हो। यह श्रीराधानाम वृन्दावन-विलासी श्रीकृष्ण के सुखविलास की निधि है। यदि श्रीराधानाम-गुणगान मैंने अपने कानों से नहीं सुना...