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ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
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हरि हरि हरि हरि सब कहैं
जगत में अनेक लोग “हरि हरि” का नाम तो लेते हैं, परंतु अपने हरि के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचानते। सत्य श्रीहरि स्वरूप तो स्वयं नित्य निकुंजेश्वरी श्री...
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जो तन रहै तो प्रिया भजैं
श्री प्रिया जी (श्री राधा) से हमारा ऐसा घनिष्ठ संबंध है कि जब तक यह तन रहेगा, तब तक हम उन्मत्त होकर निकुंज-विहारिणी श्री प्रिया जी का ही अनन्य भजन करे...
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श्री निधिवनराज की जै रहियै
श्री ललितकिशोरी देव जी निज आश्रितजनों को आज्ञा करते हुये कह रहे हैं "हे भाई! निधिवनराज का सदैव जय-जयकार करते रहो, जहाँ श्री युगल का निरंतर नित्य विहार...