ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
25 itemsचलौ साधौ निधिवन जाइयै
श्री ललित मोहिनी देव कहते हैं— ‘हे भक्तगण! चलो निधिवन की ओर; वहाँ श्री स्वामी हरिदास जू महाराज के दर्शन करेंगे। श्रीधाम वृन्दावन में वास करते हुए श्री...
औगुन तौ लीजै नहीं
संसार में गुणों को ही देखना चाहिए, दोषों को नहीं; क्योंकि श्री कुञ्जबिहारिणी लाडिली (श्री राधा) सबके हृदय के प्रेममय भावों को पूर्ण करती हैं।
बिहारी तेरे नैंना रूप भरे
श्री ललितमोहिनी देव कह रहे हैं "हे बिहारी जू, आपकी आँखों में श्री किशोरी जू की छवि समाई हुई है, जिनका दर्शन कर कर आपकी इन आँखों को कुछ और दिखाई नहीं प...
ना काहू सौं रूसनौ
हमारा किसी से न तो कोई द्वेष है और न ही किसी के प्रेम के रंग में रंगे हैं। हम तो केवल श्री श्यामा-श्याम की उस अपार और दिव्य 'नित्य-केलि' के रंग में सर...
ललित सरोवर ललित वन
श्री ललित मोहिनी देव कहते हैं— ‘अति सुंदर और रमणीय है श्रीधाम वृन्दावन, जहाँ के सरोवर भी अत्यन्त मनोहर हैं। वहाँ के सुंदर लता-कुंजों में सुंदरता की पर...
किरपा ने कृपा करी
साक्षात् कृपा ने भी ऐसी कृपा की कि अब समस्त मेरे मस्तक का समस्त सांसारिक बोझ और अनावश्यक चिंताओं का भार सदा के लिए उतर गया है। अब निश्चिंत होकर श्री व...
श्री हरिदास करैं सो होइ
श्री स्वामी हरिदास जी की कृपा से ही भक्त को नित्य-विहार-रस की प्राप्ति होती है। अतः साधक को चाहिए कि वह समस्त चिंताओं का त्याग करके सदा श्री बिहारी-बि...
कुंज महल में बैठक राखैं
कुंज-महल में ही निवास करो, क्योंकि वहीं श्री श्यामा-श्याम की अनवरत केलि होती रहती है। वहाँ गौर-वर्णा श्री राधा और श्याम-वर्ण श्री कृष्ण एक-दूसरे से इस...
अब लियौ अब लियौ अब लियौ रे
मन में हर समय यही भावना रखो कि श्री वृन्दावन अब इसी क्षण मुझ पर कृपा कर मुझे अपने भीतर ले लेंगे और श्यामा-श्याम की नित्य-लीला में सम्मिलित कर देंगे। ऐ...
निंदा करै सो धोबी कहिए, अस्तुति करै सो भाट
निंदा करै सो धोबी कहिए, अस्तुति करै सो भाट। अस्तुति निंदा दोउन ते न्यारौ, सोई साधु निराट॥ - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (28) ...
प्रान प्रिया सखि आजु बनि
आज मेरी प्राण प्यारी श्री प्रिया जी [श्री राधिका] की छवि देखते ही बनती है। आज प्रिया जी ने नीलांबर ओढ रखा है, एवं काम केलि रस में उन्मत्त होकर विहार प...
करुवा गूदरा अमृती चीपी कठुला माला बाँकी
करवा, गुदड़ी, अमृतपात्र, रज का कटोरा, कठला, माला, और बाँकी (वृंदावन की शुष्क लता का एक सर्पाकार छोटा सा दंड) - इन सात वस्तुओं से प्रयोजन रखने वाले हरि...
चतुर चिंता ना करै, उमँगि उमँगि गुन गाइ
जो कुछ होना है, वह अवश्य होगा, और जो नहीं होना है, वह नहीं होगा। चतुर व्यक्ति इस तथ्य को जानता है, अतः वह किसी की चिंता न करते हुए परम उल्लसित होकर श्...
गुरु निरमोही चाहिए, शिष्य न छाँड़ै नेह
गुरु के कठोर या निर्मम होने पर भी शिष्य को कभी गुरु के प्रति प्रेमभाव को नहीं त्यागना चाहिए। गुरु चाहे कितना भी अलग होने का प्रयास करे, किंतु शिष्य को...
धरौ बुरौ, धरिबौ बुरौ, आवै सोई पाव
धरौ बुरौ, धरिबौ बुरौ, आवै सोई पाव। श्रीकुंजबिहारी लाल के, उमँगि - उमँगि गुन गाव॥ - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (32) संचय करन...
हौं बूड़न कौं बहु करौं
मैं तो इस संसार में डूबना का ही काम कर रहा हूँ, परंतु श्री हरि मुझे डूबने नहीं देते। जब जब मैं इस संसार रूपी कुएँ में गिरने लगता हूँ तब वे मुझे हाथ पक...
निरनै बस्तु और धर्म को
युगल उपासना में वस्तु (श्री श्यामा श्याम) एवं धर्म (रस-रीति) ही सिद्धांत हैं। अन्य उपासनाओं में वेदांत के तर्क ने सब नाश ही कर दिया, क्योंकि वेदांत अर...
सो पापनि कौ मूल है, एकहि पैसा रोक
समस्त अनर्थों और पापों का मूल कारण धन का मोह (संग्रह-वृत्ति) ही है। जो जीव लोभ वश धन की गाँठ बाँधता रहता है, उसका श्रीहरि से आत्यंतिक संबंध स्वतः ही व...
जिनहिं देखि हरि देखिये तिनहिं भाव सों देखि
जिनके दर्शन करके श्रीहरि के दर्शन मिल पाते हैं, उन श्री गुरुदेव को भी उसी (हरि रूप) से ही देखिये। वे (श्रीहरि) और ये (श्रीगुरुदेव) दोनों एक ही हैं, यह...
तन झूठो मन झूठ है
श्री ललित मोहिनी देव कहते हैं— ‘यह शरीर झूठा (नश्वर) है और यह मन भी झूठा (भ्रमित) है। इसलिए हे साधक! अपने हृदय में यह दृढ़ विश्वास धारण कर कि रंग-महल...
गुरु राखै फूटौ करवा लगावै रज
गुरु राखै फूटौ करवा, लगावै रज। चेला रंगै बाँकी, बनावै सज॥ - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी (35) यह कैसी विडंबना है कि वृंदावन क...
भजन करौ भोजन करौ
श्री ललित मोहिनी देव कहते हैं—“हे मन! तू श्री रसिक बिहारी जू का उत्साहपूर्वक भजन कर, उनका प्रसाद ग्रहण कर और उनके गुणों का गान कर। दिन-रात हर प्रकार स...
बिहारीजी से बिहारीजी
श्री बिहारीजी [श्री बाँके बिहारी] के समान केवल श्री बिहारीजी ही हैं, और श्री स्वामीजी [ललिता-अवतार श्री हरिदास] के समान केवल श्री स्वामीजी ही हैं; अतः...
होनी हो सो हो गई
जो होनी थी वह हो चुकी, और जो होना है वह होकर ही रहेगा; अतः श्री बिहारी-बिहारिन जू के नित्य-विहार-रूपी प्रसाद को ग्रहण कर उनकी नित्य स्मृति [अर्थात् रू...
आयौ बसंत मदन दल साजे
बसन्त आ गया है। कामदेव ने अपने दल सजा लिए हैं। (प्रिया-प्रियतम) दोनों की ओर ( नई-नई आकाङ्क्षाओं और अभिलाषाओं की ) भीड़ लग गई है। दोनों के नेत्रों से अ...