ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
12 itemsकौन करै तप तर्पन तीरथ
एक नित्यविहार का अनन्य रसोपासक कहता है कि अब ऐसी अद्भुत रसोपासना के अतिरिक्त कौन तीन प्रकार के साधन—तप, तर्पण और तीर्थ-भ्रमण आदि में मन लगाए? [1] इसी...
श्री नागरीदासि अनन्यनि कौ गढ़, बन बाँकौ कहा कोऊ पावै
हे नागरीदास! यह श्री वृन्दावन रूपी निज-महल अनन्य रसिकों का एकांत रस-विलास का किला है। नित्य-विहार रूपी यह धन नित्य-सिद्धों की निज संपदा है और केवल उनक...
चरनकमल रज सेइहौं मन-बच-क्रम यह आस
मेरे तन-मन-प्राण और रोम-रोम का सर्वोच्च सर्वस्व तो श्री बिहारी-बिहारिन के चरण-कमलों की रजस्वरूप श्री वृन्दावन ही है। मैं मन, वचन और कर्म से दृढ़ अनन्य...
नित्य विहार सार सबको, अति दुर्लभ अगम अपार
हे भाई, समस्त परमार्थ-उपासनों का सार एवं अति दुर्लभ, अगम और अपार नित्य-विहार-रस ऐसा है कि उसमें अनन्य धर्म (प्रिया-प्रियतम के विहार) का अनुसरण करने वा...
लै करुवो कौपीन कामरी
हाथ में जल का पात्र (करुवा), शरीर पर लंगोटी (कौपीन) और ओढ़ने के लिए काली कमली धारण कर अर्थात् समस्त सांसारिक वासनाओं का भली भांति त्याग कर, जब तुम वृन...
श्रीनागरीदास अनन्य धन, धर्म सुदृढ उर धारि
श्री नागरीदास जी कहते हैं कि अनन्य भक्ति ही सच्चा धन है, इस धर्म को अपने हृदय में दृढ़ता से धारण कर लो। युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) के अनन्य प्रेम रू...
यहै उपदेस उपाइ श्रीबिहारिनिदासि
इस अद्भुत नित्य-विहार रूपी सर्वोपरि रस के उपदेश को एक मात्र गुरुदेव (श्री बिहारिन दास जी) की कृपा से ही समझा जा सकता है, क्योंकि नित्य-सिद्धों (एवं उन...
मुसिक्यात जात सखी कहत बात
अरी सखी, आज प्रियालात परस्पर प्रेम-लपेटी अटपटी बातें करते हुए मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे हैं। प्रेमातिरेक से प्रमुदित यह दोनों आनंद की तरंगों में तैर रहे ...
आप कहावत रसिक कृपन मति
कुछ लोग संसार में स्वयं को रसिक कहलाते हैं, पर उनकी मति एवं सिद्धांत कृपणता से भरा होता है। वे कर्म, धर्म, विधि, निषेध के चक्करों में फँसे रहते हैं और...
हीरा कौं ललिचात लिवासी
ठौर-ठौर पर श्रद्धा रखने वाले जन सर्वोपरी नित्य-विहार-रस रूपी हीरे को ललचाते हैं, परंतु उन्हें इस वस्तु के स्वरूप का ठीक से ज्ञान नहीं है; अर्थात् वे अ...
अति निरपेक्ष संग संग्रह
सांसारिक आसक्तियों और संग्रह की प्रवृत्ति से सर्वथा विरक्त होकर, जब साधक स्वामी श्रीहरिदास जी द्वारा प्रवर्तित 'नित्य-विहार' रस को ही अपना परम लक्ष्य ...
नित्य विहार सार सबको
'नित्य विहार' सभी ग्रंथों, वेदों आदि का सार है, जिसका न आदि है न अंत—जो अत्यंत दुर्लभ है।