ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
9 itemsतुष्ट पुष्ट तासौं रहैं
नित्य-विहार की इस दिव्य जोड़ी (श्री राधा-कृष्ण) को न तो बुढ़ापा स्पर्श करता है और न ही कोई रोग। ये दोनों कभी बाल्य या यौवनावस्था का भोग नहीं करते; ये ...
जन्म मरन माया नहीं, जहँ निसि दिवस न होइ
जहाँ न जन्म है, न मृत्यु, न माया का प्रभाव और न दिन-रात का क्रम; उस दिव्य वृंदावन धाम में अनुपम रूप वाले लाड़िली लाल सदा अपने सच्चिदानंद स्वरूप में एक...
निसबासर तिथि मास रितु
उत्सव त्यौहारों से संबंधित समस्त सांसारिक व्यवहारों को त्यागकर नित्य निकुंज मंदिर के दिन रात, तिथि मास ऋतु और समस्त उत्सवों को भाव में ही देखना चाहिए।
रजधानी वृन्दाबिपिन, वय किसोर जुगराज
नित्य धाम श्री वृंदावन ही रसिकों एवं युगल किशोर (प्रिया प्रियतम) की राजधानी है, जहां लालितादिक सहचरियाँ रस विलास के नित्य नये साज सजाया करती हैं।
नहीं तरे पाताल के
वह नित्य-विहार-रूपी तत्त्व न तो पाताल में है और न ही गोलोक में; अपितु वह इस विराट् ब्रह्माण्ड के हृदय-कमल—श्री वृन्दावन धाम—में अपना नित्य निवास बनाए ...
गौर स्याम मंजुल मृदुल, अद्भुत की कांति
गौर-श्याम स्वरूप वाले प्रिया-प्रियतम के श्रीअंगों की कांति अत्यंत सुन्दर, कोमल और अद्भुत है। यह दिव्य जोड़ी परस्पर अधरामृत-रस का पान करते हुए सतत सुख ...
नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं
वह (नित्य-विहार-रूपी अद्भुत वस्तु) न निर्गुण है, न सगुण; बल्कि दोनों से विलक्षण है। न वह पास है, न दूर—प्रेमियों के लिए वह सर्वत्र है, किंतु प्रेम-विह...
जुगल ध्यान सीखै सुनै
श्री भगवतरसिकजी कहते हैं कि जो साधक श्रीयुगल के इस ध्यान को मन लगाकर सीखता, सुनता और समझता है, उन पर नित्यरसिक (श्रीप्रिया-प्रियतम अथवा स्वामी श्री हर...
रजधानी वृंदाविपिन
वृन्दावन धाम नित्य-दम्पति श्री राधा–कृष्ण की राजधानी है, जहाँ सहचारियाँ उनकी ‘केलि-लीलाओं’ से सम्बन्धित विविध सेवाओं का संपादन करती रहती हैं।