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ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
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तैं भाजन कृत जटित विमल
जैसे कोई विविध रत्नों से जटित स्वर्णपात्र में अमृत भरकर उसे चूल्हे पर चढ़ाकर चन्दन की लकड़ी से अग्नि प्रज्बलित करके उसमें सरसों की खली को रांधे, अर्था...
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हित हरिवंश विचारि कैं
श्री हित हरिवंश महाप्रभु विचार पूर्वक कहते हैं कि इस दुर्लभ मानव देह को पाकर रसिक-गुरु के चरणों की शरण ग्रहण करो। यदि संभव हो, तो संसार के समस्त प्रपं...
shloka
मेरे प्राणनाथ श्रीश्यामा, सपथ करौं तिन छियें
मैं शपथ खा कर कहता हूँ कि मेरी प्राणनाथ, स्वामिनी श्री लाड़ली जू महाराज, श्री राधा ही हैं।
shloka
हित हरिवंश विचारि कैं
श्री हित हरिवंश महाप्रभु उपदेश देते हैं कि इस नश्वर मानव शरीर को व्यर्थ न जाने दो—इसे सार्थक बनाओ रसिक गुरु के चरणों की शरण लेकर। यदि संभव हो तो समस्त...