ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
8 itemsमन तें श्री वृंदाविपिन
साधक को चाहिए कि वह मन से सदा वृन्दावन-विपिन में निवास करे और सखी-भाव धारण करके नित्य श्री ललना-लाल, अर्थात् राधा-कृष्ण, की मधुर छवि का दर्शन करता रहे...
जैति जैति सब वन नृपति, श्री वृंदावन धाम
समस्त वनों का राजा श्री वृंदावन धाम है, क्योंकि यहाँ श्यामसुंदर के वामांग में परम रमणीय स्वरूप वाली श्री स्वामिनीजी (श्री राधा) प्रेम में उन्मत्त होकर...
बड़ी वस्तु मधि विघन अति, होत न तनक उपाव
श्री वृन्दावन-वास फलस्वरूप है, जिसे प्राप्त करने में अनेक विघ्न आ सकते हैं। इसे प्राप्त करने का अन्य कोई उपाय नहीं; केवल नित्य किशोरी श्री राधिका की क...
ऐसो श्री वृंदाविपुन, परम प्रेम रस रूप
श्री वृन्दावन का यह पावन धाम साक्षात् परम प्रेम और रसमय स्वरूप है। यहाँ रसिक, उपासक और संत जन अत्यंत विलक्षण और दिव्य भाव में मग्न होकर विचरण करते हैं...
मंगल मनि आनंद निधि, परम प्रेम रस रूप
श्री वृन्दावन साक्षात् मंगलमणि और आनंद की निधि है, जो परम प्रेम-रस का ही साकार स्वरूप है। ऐसे अनुपम श्री वृंदा-विपिन की महिमा अनंत है, जिसकी तुलना संस...
वृंदावन की सुधि करत
अनेक साधक श्रीवृंदावन वास की अभिलाषा तो करते हैं, किंतु उनका कभी ऐसा संयोग घटित नहीं हो पाता। प्रभु की यह माया इतनी विचित्र है कि प्रबल इच्छा के उपरां...
रसिक अनन्य उपासिका भाव भरे रस ऐंन
रसिक अनन्य उपासक इस प्रकार भाव-विभोर होकर रस से भरे होते हैं कि वे नित्य अपने नैनों से प्रिया-प्रियतम की रसभरी लीलाओं का अवलोकन करते रहते हैं, परंतु अ...
तिनकूँ लाड लडात निति
श्री धाम वृंदावन में परम प्रवीण प्रियतम (कुंजबिहारी) सदा प्रिया जी (श्री राधा) को लाड़ लड़ाते हैं। प्रिया जी के बदनचंद्र को चकित होकर निहारते रहते है...