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सुनो मन! यह अनन्य की रीत
सुनो मन! यह अनन्य की रीत। गौर श्याम प्रिय परिजन तजी कहुं, करत न सपनहु प्रीत। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (119) ...
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रटो रे मन! छिन छिन श्यामा श्याम
अरे मन! ‘श्यामा-श्याम’ इस युगल नाम को प्रत्येक क्षण रटता रह। यह श्यामा- श्याम सच्चिदानन्द ब्रह्म के ही दो अभिन्न स्वरूप हैं। [1] अरे मन! इनके नाम को श...