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ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
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जो लालच कोटिक मिले, तौन चित्त ललचाय
श्री वृन्दावन धाम की ऐसी विलक्षण माधुरी है कि यदि हृदय एक बार इसका रस चख ले, तो चाहे करोड़ों प्रकार के प्रलोभन क्यों न मिलें, वह फिर कहीं ललचाता नहीं ...
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वृंदावन की बात कछु, क़हत बने नहिं बैन
वृंदावन की बात कछु, क़हत बने नहिं बैन। नैंन समाने विपिन में, विपिन समाने नैंन॥ - श्री माधुरी दास, वृंदावन माधुरी (23) श्री वृन्दावन की महिमा के विषय...
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जो गावहिं सुमरहिं सदा मन बच विपिन विलास
जो व्यक्ति मन और वचनों से सदा वृंदावन की लीलाओं का यशोगान और सुमिरन करता है, वह सहज ही आनंद और श्री वृंदावन धाम में वास प्राप्त कर लेता है।
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करैं मनोरथ पिय के जो कछु उपजै जीय
प्रियतम श्यामसुन्दर के हृदय की समस्त अभिलाषें को श्री राधा पूर्ण करती हैं। श्री राधिका, श्रीकृष्ण के हृदय (अंक) में सदा विराजती हैं, और श्रीकृष्ण प्रे...
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वृंदावन की माधुरी, मन को मन हर लेत
श्री वृंदावन धाम की माधुरी मन के मन का भी हरण कर लेती है जिसका सहज स्वभाव है समस्त अंगों को सुख प्रदान करना।