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Sacred Scripture

वृंदावन शत लीला

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

15 items
general

बसिके वृन्दाविपिन में, इतनौ बड़ौ सयान

श्री वृन्दावन में वास करके सबसे बड़ी समझदारी यही है कि श्री युगल सरकार के स्मरण के बिना एक क्षण भी न जाने पाए।

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एती मति मोपै कहा

शोभा की सीमा श्री वृन्दावन की बात कहने के लिए मुझमें मति कहाँ से आई है? फिर भी निर्लज्ज होकर, धृष्टतापूर्वक ही कुछ कह रहा हूँ।

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देवी वृन्दाविपिन की, वृन्दा सखी सरूप

श्री वृन्दावन की अधिष्ठात्री वृन्दा देवी सखी-स्वरूप में अवस्थित होकर, जैसी युगल की रुचि होती है, वैसी ही वृन्दावन की कुंजों की रचना करती रहती हैं।

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आवै छबि की झलक उर, झलकै नैनन वारि।

वृन्दावन में वास करते हुए हृदय में गौर श्याम बसते हों, नैनों से प्रेमाश्रु झलकते हों, परम प्रेमास्पद श्री राधा कृष्ण का स्मरण करते-करते करते तन की भी ...

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इत बौना अकाश फल

बौना आदमी यदि आकाश-फल को (वृन्दावन को) प्राप्त करना चाहे तो एक मात्र कृपा के बिना इसका अन्य कोई उपाय नहीं।

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मंडित जमुना वारि यौं, राजति परम रसाल

नील कान्ति युक्त परम मधुर श्री यमुना जल श्री वृन्दावन के चहुँ ओर ऐसे बहता हुआ सुशोभित होता है जैसे नील मणियों की माला।

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बसिवौ वृन्दाविपिन कौ, यह मन में धरी लेहु, कीजै ऐसौ नेम दृढ़, या रज में परै देह।

अपने मन में वृन्दावन वास का दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए और ऐसा दृढ़ व्रत लेना चाहिए कि यह देह वृन्दावन रज में ही पड़ा रहे (एवं मिल जाये)।

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वृन्दावन वैभव जितौ, तितौ कह्यौ नहीं जात

श्री वृन्दावन की सम्पति (युगल सरकार) और रस वैभव को देखकर लक्ष्मी भी ललचाती है, वाणी द्वारा उसे कहना असंभव है।

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सारद जो सत कोटि मिले

सारद जो सत कोटि मिले, कलपन करैं विचार। वृन्दावन सुख रंग कौ, कबहुँ न पायौ पार।। - श्री ध्रुवदास, वृन्दावन शत लीला (98) यदि कोटि कोटि सरसवती कल्पों तक व...

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छाँड़ि स्वाद सुख देह के

साधक को चाहिए की वह लोक लाज, देह के सुख स्वादादि का त्याग कर और तन मन से दीन हो वृंदावन में निर्भय होकर निवास करे।

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वृन्दावन में जो कबहूँ

श्री वृंदावन में वास करते हुए यदि कुछ भी भजन नहीं होगा तो भी देव मुनि दुर्लभ श्री वृंदावन रज तो उड़ कर देह को लगेगी। पीने को परम पावन श्री यमुना जल तो...

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वृंदावन के वास कौ, जिनके नाहीं हुलास

उन माता, मित्र, पुत्र, पत्नी अदा का निश्चित रूप से त्याग कर देना चाहिए जिनको वृन्दावन वास का उत्साह नहीं है |

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खण्ड

शरीर के खण्ड खण्ड हो जाने पर भी अंगों के सैकड़ों टुकडे हो जाने पर भी श्री वृन्दावन को नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि इसका त्याग करना बड़ी भारी भूल है।

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वृन्दावन झलकनि झमक फूले नैंन निहारि

श्री वृन्दावन की झलक को प्रेमोत्तफुल्ल नेत्रों से देखना चाहिए। यह झलक इस प्रकार की है की इस पर सूर्य, चंद्र आदि प्रकाशवान वस्तुएं न्यौछावर की जा सकती ...

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वृन्दावन सत करन कों, कीन्हों मन उत्साह

मेरे मन में श्री वृन्दावन शतक (एवं रस) की रचना का उत्साह हुआ है किन्तु नवल श्री राधिका की कृपा के बिना इसका निर्वाह सम्भव नहीं है।