ब्रज के सेवैयाँ
जीवन चरित
श्री ब्रज के सेवैयाँ वाणी संग्रह
कर कंज से थामते हो जिसको
हे ब्रजराज श्री कृष्ण, जिस कदंब की डाल पर आप अपने कोमल कर कमल रखकर खड़े होते हैं, उसी कदंब का मुझे एक छोटा सा फूल बना दीजिए। जिस ब्रज की धूलि को आपके...
सुख करे तन को मन को
सखी, यह प्रेम सरोवर का जल ऐसा है जो तन को और मन को सुख देने वाला है। [1] हम यहाँ स्नान करके ब्रज की रज को अपने शीश पर चढ़ाते हैं। [2] हमारी प्रार्थन...
वास करें ब्रज में फिर
हम सदा नित्य ही ब्रज में वास करते हैं, हमें अन्य देशों और प्रदेशों का रास्ता भी जानना नहीं है। [1] हमारे हृदय में नित्य ही प्रिया लाल का प्रेम समाया...
खेलत खेलत कुंजन में
गोपांगनाएँ उन्हें ढूँढ़ती हुई अपने-अपने मन में व्याकुल हो उठीं। [2] श्री राधिका ब्रज में नित्य विहार करती हैं, जिसका रहस्य कोई नहीं जान सकता अर्थात् ...
राधिका पायके सेन सबै
श्री राधिका की आज्ञा पाकर सभी सखियाँ अचानक मनमोहन श्रीकृष्ण पर झपट पड़ीं। [1] उन्होंने श्रीकृष्ण का पीताम्बर और कमरिया (ऊपरी वस्त्र) छीन लिया और उन्ह...
छबि थी छबि रासि के सन्मुख जो
ब्रजधाम अनंत महिमा से युक्त है, जहाँ हर ओर केवल सुंदरता ही बिखरी है, मानो यह धाम स्वयं सुंदरता का पुंज हो। यहाँ की समस्त गलियाँ और बीथियाँ वृक्षों और...
इत वनमाल उत भृकुटी विशाल
इधर श्रीकृष्ण वनमाला से सुसज्जित हैं, और उधर श्रीराधिका की विशाल भृकुटी मन को मोह रही है। इधर श्रीकृष्ण के ललाट पर मोर मुकुट की शोभा है, तो उधर श्रीरा...
जिहिं कुंजन रास विलास करौ
हे श्री श्यामा-श्याम! जिस निकुंज में आपका रास-विलास हो रहा हो, मैं उस निकुंज की प्रतिदिन प्रदक्षिणा करूँ। [1] आप जिस मंदिर में निवास करते हों, मैं उ...
कोऊ महेश रमेश मनावत
कोई शिवजी की भक्ति करता है, कोई भगवान विष्णु को प्रसन्न करता है, कोई धन के देवता कुबेर की आराधना करता है, और कोई गणेश जी का भजन करता है। [1] कोई नरसि...
महारास देखवे पधारे शिव गोपिका ने
महारास के दर्शन करने के लिए भगवान शिव वृंदावन में पधारे, लेकिन द्वार पर खड़ी ललिता सखी ने शिवजी से कहा कि पहले दीक्षा लीजिए तब महारास में प्रवेश कीजि...
सुकुमारिता देखि कुमारी लजैं
श्रीकृष्ण ने जब गोपी का रूप धारण किया और अपनी सुकुमार सुंदरता दिखलाई, तब वास्तविक गोपियाँ भी लज्जित हो गईं, जैसे कोई चालाक चोर को देखकर चौंक जाए। गोप...
मुख सूख गया यदि रोते हुए
इस पद में भक्त अपने आराध्य से मान करते हुए, कटाक्ष के स्वर में कहता है— जब रोते-रोते मुख सूख गया और प्राण व्याकुल हो उठे, तब यदि अमृत पिलाया तो उसका क...
उर ऊपर नित्य रहूँ लटका
हे नंदलाल! मुझे ऐसा बना दो कि मैं तुम्हारे हृदय से सदा लिपटा रहूँ, मुझे अपनी वनमाला का फूल बना दो। [1] मुझे उस कलिंदी तट का अंश बना दो, जहाँ तुम्हार...