जगद्गुरु कृपालु महाराज
जीवन चरित
श्री जगद्गुरु कृपालु महाराज वाणी संग्रह
सौ बातन की बात इक
सौ बातों की एक बात यही है कि केवल उन मुरलीधर (श्री कृष्ण) का ही ध्यान हृदय में धारण करो। अपनी सेवा की अभिलाषा और लालसा को निरंतर बढ़ाते रहो; यही समस्त...
काम क्रोध मद लोभ कहँ
हे मूर्ख मन! काम, क्रोध, मद और लोभ को केवल दबाने का प्रयास मत कर; इन्हें श्यामसुन्दर की ओर मोड़ दे। यदि इच्छा करनी है तो उनके सुख की इच्छा कर, यदि क्र...
जाकी माया ते नचे, योगी यती महान
जिसकी माया से बड़े-बड़े योगी एवं मुनींद्र भी नाचते (काँपते) हैं, उसी ब्रह्म श्री कृष्ण को ब्रज में ब्रजांगनाएँ अपने हाथों की तालियों पर नचा रही हैं।
देशकाल नहिँ नियम कछु नहिँ कछु शिष्टाचार
मैं उस विलक्षण प्रेम-पंथ पर सर्वस्व न्यौछावर करता हूँ, जहाँ देश, काल अथवा बाह्य शिष्टाचार का कोई बंधन नहीं है। यहाँ केवल निष्कपट हृदय से निष्काम प्रेम...
बंधन और मोक्ष का, कारण मनहि बखान
बंधन और मोक्ष का कारण केवल मन ही है। अतः कोई भी भक्ति हो, मन से भगवान का चिंतन तो अवश्य होना चाहिए।
काहे खोजत ब्रह्म को
हे ज्ञानियों! वेद की विविध ऋचाओं में ब्रह्म को निरर्थक क्यों खोज रहे हो? वह तो नंदरानी के आँगन में ऊखल से बँधा हुआ सुलभ है। यदि मेरे वचन पर विश्वास न ...
ज्ञान मरै दै मुक्ति पद, कर्म मरै दै स्वर्ग
मोक्ष देकर ज्ञान समाप्त हो जाता है, स्वर्ग देकर अच्छा कर्म समाप्त हो जाता है। किंतु केवल एक भक्ति ही ऐसी है जो सदा अमर रहती है जहां भक्त को स्वर्ग, मो...
संत संग सत्संग करु
किसी वास्तविक रसिक की शरण ग्रहण कर, उनका सतत सत्संग करते रहने से श्रद्धा, रति एवं भक्ति क्रमशः स्वयं प्राप्त हो जाती है।
कोटिन ज्ञानिन मध्य कोउ प्रेम-सुधा-रस पाय
करोड़ों ज्ञानियों में किसी बड़भागी को ही प्रेम सुधा रस प्राप्त होता है। जैसे सनकादि शुकादिक परमहंस ब्रजरस में डूब गये।
हौं मानत हौं सदा को
हे श्री कृष्ण ! अनादिकाल से मैंने सदा पाप ही किया है, यह मैं मानता हूँ। किंतु तुम भी तो अपनी पतित पावनी प्रतिज्ञा पर विचार करो।
तुम मेरे थे रहोगे यह श्रुति वचन तिहार
हे श्री कृष्ण! भले ही मैं पतित हूँ, परंतु तुम अनादि काल से मेरे थे, और अनंतकाल तक मेरे ही बने रहोगे — यह वेदों में तुम्हीं ने स्वयं कहा है। फिर हे अधम...
जाके अगनित गुनन को गावत वेद ऋचान
जिन श्री कृष्ण के अनगिनत गुणों को गाते हुये चारों वेद नहीं थकते, वही ब्रह्म श्री कृष्ण ब्रज में गोपियों को हठात् छेड़ कर 'दारी के’, इत्यादि गाली को सु...
चितवत चित करषत जिते
श्री कृष्ण की एक रसमयी दृष्टि से बड़े-बड़े परमहंस समाधि भुला देते हैं और परमहंसों की तो गणना ही क्या, जब स्वयं देवाधिदेव भगवान् शिव ने भी उस रस के आस्...
जय नंदनंदन सुख धाम हरे
जय नंदनंदन सुख धाम हरे, गोपी जन वल्लभ श्याम हरे। अनंत आनंद के धाम नंद के पुत्र की जय हो। गोपिजनों के प्रिय श्री कृष्ण की जय हो। जय जीवन धन ब्रज बाम ...
सबै शक्ति हैं नाम में
हे मन! भगवान के नामों में समस्त शक्तियाँ समाहित हैं, इसलिए तू रात-दिन केवल उसी का आराधन कर। किंतु स्मरण रहे, जो मनुष्य नामापराध करते हैं, उन्हें नाम क...
अधम उधारन नाम सुनि
हे श्री कृष्ण! तुम्हारा पतित-पावन नाम सुनकर मन में आशा उत्पन्न होती है, क्योंकि मैं पतित हूँ और मेरा भी काम बन सकता है। किंतु जब “भक्त-वश्य”, “भक्त-वत...
सबै शक्ति हैं नाम में
श्री राधा कृष्ण के नाम में उनकी समस्त शक्तियां सदा हैं। अतः हे मन! तू निरंतर स्मरण कर। किंतु एक बात याद रखना। वह यह कि नामापराध न होने पाये।