युगलवर, निरतत कुंज मझार। देखति ललितादिक सखियन सब, पुनि–पुनि कहि बलिहार। आजु होड़ परि गई निरत महँ, युगल नवल सरकार। विविध अंग बहु भेद संग दोउ, हाव–भाव–वि...