सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतश्री चतुर दास
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री चतुर दास वाणी संग्रह

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सुख की संधि समझे बिना

सुख की संधि (श्रीधाम वृन्दावन) में अहर्निश चलने वाले नित्यविहार का ज्ञान न होने के कारण ही लोग सुख-दु:ख, लाभ-हानि और मान-अपमान जैसे द्वंद्वों के सागर ...

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अलकैं छूटीं वदन पर श्रम जल

सखी भावापन्न श्रीस्वामी चतुरदासजी कहते हैं कि श्यामा कुंजबिहारी की उस सुरतान्त छवि का मैं अहर्निश निरन्तर अवलोकन किया करता हूँ, जिसमें काली घुँघरारी ल...

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आजु महा मंगल मन माई

हे सखी, आज मेरा मन महान आनंद को प्राप्त हो रहा है क्योंकि श्री प्रिया प्रियतम दोनों अत्यंत आनंद में भर अपनी रुचि के अनुसार केली विलास (क्रीड़ा) कर रह...

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आजु की शोभा कही न जाइ

अरी सखी, आज की शोभा किस भांति अभिव्यक्त करूं, कहने में नहीं आ रही है। स्वामी श्री हरिदास जी, श्री वीठल विपुलदेवजी, श्री विहारिनदेवजी, श्री सरसदासजी एव...

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सुरति समानी रूप में

प्रेम साक्षात रूप में समाहित है और रूप प्रेम में; दोनों एक-दूसरे में पूर्णतः ओतप्रोत हैं। श्रीचतुरदास जी कहते हैं कि रूप और प्रेम की पराकाष्ठा श्रीकुं...

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कुटिल लम्ब कल चीकने

श्री श्यामा-कुंजबिहारी के घुँघराले, लंबे, कोमल और कानों तक झूलते सुंदर घने केशों को निहारकर चतुर सखी ऐसी मोहित हो जाती है कि वह अपने प्राणों तक को उन ...

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प्रियालाल देखि मन फूले

लाल (श्री कृष्ण) प्रियाजू (श्री राधा) को देखकर फूले नहीं समा रहे हैं। वे उन्हें बार-बार देख कर आनन्दित हो रहे हैं और उनके रूप रसासव का पान कर अद्भुत स...

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श्री स्वामी हरिदास भजो मन, श्री हरिदास भजौ

श्री चतुर दास जी अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन, स्वामी हरिदास जी का भजन कर एवं श्री प्रिया प्रियतम के नित्य विहार का अखंड चिंतन कर। दू...

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सो सुख वृन्दाविपिन है मूल आदिद्रुम जैस

संसार में जो भी सुख दिखाई पड़ता है उसका मूल स्रोत श्री वृंदावन ही है। श्री चतुरदास जी कहते हैं कि उसे लालितादिक सहचरियाँ नित नव कैशोर-मंडित श्री श्याम...

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श्रीस्वामी हरिदास भज

श्री चतुर दास जी अपने मन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन, स्वामी हरिदास जी का भजन कर एवं श्री प्रिया प्रियतम के नित्य विहार का अखंड चिंतन कर। यह...

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ललितमोहिनी कृपा करी

श्री चतुरदास जी कहते हैं कि उनके गुरुदेव श्री ललित मोहिनीदास जी की कृपा से, वे नित्य विहार पारायण श्यामा कुंजबिहारी को निरखते हैं। समस्त सांसारिक द्वन...

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श्रीस्वामी हरिदास भजि, सिद्ध होइ सब काम

श्री चतुरदास जी अपने मन को समझाते हुए कहते हैं, “हे मन, तुम श्री स्वामी हरिदास जी महाराज का भजन करो (अर्थात् अखंड नित्य विहार उपासना करो), जिससे समस्त...

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जा सुख नैना सुख ढके

जिस रस से नैनों को सुख प्रदान करने वाला सुख ही नष्ट हो जाय, वह सुख सच्चा सुख नहीं है। सच्चा सुख तो वह है जिससे वियोग की व्यथा सदा-सदा के लिए मिट जाय ।

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श्रीवृन्दावन सहज समाज

अरी सखी, श्रीधाम वृन्दावन की स्वाभाविक शोभा-सम्पत्ति भी बड़ी मनोहारी है। यह नित्य है, इसका त्रिकाल में कभी विनाश नहीं होता। यह समस्त मायिक दोषों से रह...

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चतुरदास चित चौंप सों

श्री चतुरदास जी के अनुसार, हृदय में परम उल्लास संजोकर श्री वृन्दावन धाम में निवास करना चाहिए और निरंतर युगल सरकार के दिव्य केलि-विहार का दर्शन करना चा...