श्री दयाराम
जीवन चरित
श्री श्री दयाराम वाणी संग्रह
योग यज्ञ जप तप तिरिथ
यद्यपि ब्रज की गोपिकाएँ योग, यज्ञ, जप, तप, तीर्थ, ज्ञान, धर्म, व्रत और नियम आदि में प्रवृत्त नहीं थीं, फिर भी श्रीकृष्ण ने उन्हें केवल उनके निष्काम औ...
ढपें दोष गुन फुट करें पर हरिजन यह चाल
परम वैष्णवों और संतों की यही विलक्षण पद्धति है कि वे दूसरों के दोषों को ढक लेते हैं और केवल गुणों को ही प्रकाशित करते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे महादेव ने...
दीनबंधु अधमुद्धरन, नाम ग़रीब निवाज़
हे ब्रजराज! आप दीनबंधु हैं तो क्या मैं दीन नहीं हूँ, आप अधमों का उद्धार करने वाले हैं तो क्या मैं अधम नहीं हूँ, आप ग़रीबनिवाज़ हैं, तो क्या मैं ग़रीब ...
पीतांबर परिधान प्रभु राधा नील निचोल
श्री कृष्ण पीतांबर धारण करते हैं और श्री राधा नीलांबर धारण करती हैं। इसका हारद तोल (हार्दिक भाव का रहस्य मर्म) यह है कि ऐसा करने से दोनों को एक दूसरे ...
रसिक नैन नाराचकी अजब अनोंखी रीत
रसिकों के नयन-बाणों की अनोखी रीत है, वे दुश्मन का तो स्पर्श तक नहीं करते और अपने मीत को ही मारते हैं।
प्यारी प्रीतम सों लिख्यौं, मत परियौ मौ ध्यान
प्यारीजू अपने प्रियतम को लिखती हैं कि तुम मेरा ध्यान न करना अन्यथा तुम भी मेरे जैसे हो जाओगे। फिर मैं मान किस पर करूँगी?
लोक लाज कुल वेद छूटे सबे विवेक बल
जब दिव्य प्रेम का तीव्र और असह्य बाण हृदय में लग जाता है, तब लोक-लाज, कुल-मर्यादा, वेद-शास्त्र, और विवेक का बल जैसी सारी सीमाएँ टूट जाती हैं।