जो रस सदा अखंड और एकरस हो, मानो असीम महा सागर के समान निरंतर प्रवाहित हो रहा हो, ऐसे नित्य विहार रस का श्री गगनदास जी अन्य सखियों के संग सतत अवलोकन कर...