श्री हरिराय
जीवन चरित
श्री श्री हरिराय वाणी संग्रह
बन्यो माई पगा श्याम सिर नीको
हे सखी, आज श्याम सुंदर ने सुंदर पगड़ी धारण करी है। उन्होंने सुंदर धोती और उपरेना को ओढ़ रखा है एवं मोती के सुंदर गहने धारण किए हुए हैं। [1] श्री श्य...
पान खवावत कर कर बीरी
श्री राधा अपने सुंदर हाथों से श्री श्याम सुंदर को पान खिला रही हैं। वह एकटक मोहन के मुख को निहार रही हैं, एवं वह अधीर हो जाती हैं जब उनकी पलकें लगती ...
जैंवत लाल लाड़िली राजें
दिव्य दम्पति श्री राधा कृष्ण सवेरे के भोग पाने के लिए विराज रहे हैं। श्री राधा कृष्ण मध्य में विराज रहे हैं, ललिता एवं अन्य सखियाँ कनक [सोने] के पात्...
मेरे पलकन सो मग झारूँ
मैं अपनी पलकों से पथ को बुहारूँगा क्योंकि वह [मेरे प्रियतम] इस मार्ग से ही मेरे पास आएँगे, मैं अपने तन मन एवं यौवन को उन पर वार दूंगा। [1] मैं सेज स...
कान्हा धारे रे मुकुट खेले होरी
श्री श्याम सुंदर सुंदर मुकुट पहने होली का सुंदर खेल खेल रहे हैं। इधर से कुंवर कन्हैया आ रहे हैं और उधर से श्री राधा गोरी आ रही हैं।[1] उन्होंने अपनी ...
यह तुमसों माँगों गिरिराई
हे गिरिराज महाराज, आपसे यही वर माँगता हूँ कि जन्म जन्म आपके समीप ब्रज में ही निवास करूँ, एवं ब्रज की रज को छोड़ कर कहीं भी न जाऊँ। [1] मैं नित्य ही ...
प्यारी झूलन पधारो झुकि आये बदरा
एक सखी श्री राधा से कहती है कि हे प्यारी ! झूला झूलने पधारो, देखो घने बादल भी आगाए। जब आप समस्त श्रृंगार से अलंकृत होती हैं एवं नैनों में काजल लगाती ह...
बसो मेरे नैनन में दोऊचंद
श्री हरिराय जी कह रहे हैं "मेरी आँखों में वृन्दावन के दोनों चंद्र श्री राधा कृष्ण ही बसे हैं, गौर वर्ण की श्री वृषभानु नंदिनी हैं और श्याम वर्ण के नन्...
तो झूलों तुम संग हरें हरें जो झुलाओ
श्री राधिका प्यारी श्री कृष्ण से कह रहीं हैं कि यदि आप धीरे-धीरे झुलाओ तो आपके संग झूलूँ। आप तो ऊटपटांग झोंटा देकर मुझे डराते हो। [1] यदि आप धीरे-धीर...
श्री ब्रज-ब्रज-रज, ब्रज-बधु, ब्रज के जन समुदाय
मेरी मति नित्य ऐसी बनी रहे कि वह ब्रज-रज, ब्रज-बधु, ब्रज के जन-समुदाय, ब्रज के कानन और ब्रज के पर्वतों आदि की सदा वंदना करती रहे।
अरी तू काहे अनमनी
हे राधिका जू, तुम अचानक इतनी अनमनी क्यों हो गयी हो कि कृष्ण के पुकारने पर भी नहीं बोल रही हो ? अभी तक तो तुम हँस-खेल रही थी, बातें कर रही थी और मेरे प...
कुसुम सेज पिय प्यारी पौढे करत है रस बतियाँ
प्रिया प्रियतम श्री राधा कृष्ण फूलों की सेज पर पौढ़े हुए रस वार्ता कर रहे हैं। [1] प्रेम रस वार्ता करते करते कभी प्रिया प्रियतम हर्षित होते हैं तो कभी...
भाग्यवान वृषभानुसुता सी को तिय त्रिभुवन माहीं
इस संसार में श्रीराधा जैसी भाग्यशालिनी कोई नहीं, जिनके प्रियतम, तीनों लोकों के अधिपति श्रीकृष्ण, सदैव उनके कंधों पर प्रेम से गलबहियां डाले रहते हैं। [...
पिय तोही नयनन ही में राख़ूँ
हे, मेरे प्रियतम, मैं सदैव आपकी छवि को अपनी आँखों में बसा कर रखूँ। [1] आपके एक रोम की छवि पर मैं समस्त जगत को न्योछावर कर दूँ। [2] श्री हरिरायजी कहते ...