श्री कबीरदास
जीवन चरित
श्री श्री कबीरदास वाणी संग्रह
कबिरा कबिरा क्या कहे, जा जमुना के तीर
कबिरा कबिरा क्या कहे, जा जमुना के तीर। इक इक गोपी प्रेम पै, बहिगे कोटि कबीर॥ - श्री कबीरदास श्री कबीरदास जी संकेत करते हैं कि “कबिरा-कबिरा” जपने से ...
जलमैं बसै कमोदनी, चंदा बसै अकाश
कमल जल में खिलता है और चंद्रमा आकाश में रहता है। परंतु उसका प्रतिबिंब जब जल में चमकता है, तो दूरी होते हुए भी वह समीप प्रतीत होता है। ऐसे ही जो जिसके ...
जनम तेरा बातों ही बीत गयो
श्री कबीरदास अपने मन से कहते हैं कि हे मन, तेरा जनम बातों में ही बीता जा रहा है, तूने कभी कृष्ण नाम नहीं लिया ? तू पाँच वर्ष का भोला भाला था। उसके बाद...
माला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुँह माहि
कबीर दास जी कहते हैं कि हाथ में माला के मनके घूम रहे हैं और मुँह के भीतर जीभ नाम का उच्चारण कर रही है, किंतु यदि चंचल मन दसों दिशाओं में भटक रहा है, त...
मन ना रँगाये रँगाये जोगी कपरा
जोगी के मन में प्रेम का रंग तो नहीं है, उसने केवल कपड़े रंगवा लिए हैं। वह आसन मारकर मंदिर में बैठ तो गया है, परंतु मूर्ति में भगवान की भावना बनाने (एव...
यह तो घर है प्रेमका
यह प्रेम का घर है, कोई साधारण घर नहीं है। इस घर में केवल उसी को प्रवेश मिलता है जो अपना सिर उतारकर धरती पर रखकर आता है (अर्थात् आत्मसमर्पण कर देता है)...