श्री प्रेम सखी
जीवन चरित
श्री श्री प्रेम सखी वाणी संग्रह
मेरौ मन संतन हाथ बिकानौं
मेरा मन रसिक संतों के हाथों में बिक चुका है जिनकी कृपा से अब इस हृदय में भी अद्बुत सुख सार रूपी वृंदावन रस का प्रादुर्भाव हो चुका है। [1] जिस प्रकार ...
प्यारी मन भावै सो कीजै
हे श्री प्यारी जू (राधे), जैसी आपको रुचे वैसा ही कीजिये। मेरे मन मेरे वश में नहीं है, कृपया इसे अपने चरण कमलों में लगा लीजिये। [1] जो आप करती हो बस व...
हो रसिया मैं तो सरन तिहारी
हे रसिया, मैं आपकी शरण में आया हूँ। मेरे पास न साधना का बल है न वचन चातुरी, हे गिरधारी, मुझे तो एकमात्र आपके चरण कमलों का ही भरोसा है। मैं पतित हूँ, ल...
इन कुंजन विहरत नित ही नित
वृंदावन के इन कुंजों में श्री राधा कृष्ण नित्य ही विहरण करते हैं। सेवा कुंज अद्भुत छवि को बरसाता है, जहां जहां भी दृष्टि जाती है वहीं ह्रदय प्रेम से र...
जिनके मुख नहीं निसरत राधे
श्री प्रेम सखी जी कहते हैं कि जिसके मुख से "श्री राधे" नाम नहीं निकलता, उसका मुख कुत्ते और सूअर के समान है। ऐसे व्यक्ति का दर्शन परमार्थ के मार्ग में ...