श्री रघुनाथ दास गोस्वामी
जीवन चरित
श्री श्री रघुनाथ दास गोस्वामी वाणी संग्रह
वह समय कब आएगा
वह समय कब आएगा कि मैं ब्रज में रहूंगा? वृंदावन की कुंजों में भटकते हुए, भाव प्रेम से ओतप्रोत, मैं अपनी आँखों में राधा कृष्ण की छवि भर नित्य ही आंसू बह...
आशाभरैरमृतसिन्धुमयैः कथञ्चित्
हे श्रेष्ठभंगि स्वामिनि [श्री राधे] ! अमृत सिन्धु [आपके चरण कमल] की प्राप्ति की प्रत्याशा में अब तक मैं अति कष्ट पूर्वक समय बिता रही हूँ। अब भी यदि आप...
स्वमुखान्मन्मुखे देवि कदा
हे करुणामयि देवी श्री राधे ! चारों ओर देखते हुए अवसर पाकर कदा आप स्नेह पूर्वक अपने मुख का चर्वित पान मेरे मुख में ही प्रदान करोगी?
रतिं गौरीलीले अपि तपति सौन्दर्यकिरणैः
हे मन! जो अपनी सौन्दर्य-किरणों से रति, गौरी एवं लीला को सन्तप्त करने वाली हैं, सौभाग्य समूह से जो इन्द्राणी, लक्ष्मी तथा सत्यभामा को पराजित करने वाली ...
देवि दुःखकुलसागरोदरे दूयमानमति दुर्गतं जनम्
हे देवि श्रीराधिके ! मैं दुःखसमूहरूप दुष्पार सागर में निराश्रय अवस्था में अति दुर्गति को प्राप्त कर रही हूँ। आप अपनी कृपारूप दृढ़ नौका में चढ़ाकर अपने...
अजाण्डे राधेति स्फुरदभिधया सिक्तजनयाऽनया
इस ब्रह्माण्ड में जो व्यक्ति 'श्रीराधा'- इस उज्ज्वल नाम द्वारा सब मनुष्यों को प्रेम-पूर्वक नमस्कार करते हुए श्री कृष्ण का भजन करता है, अहह ! प्रतिदिन ...
य एकं गोविन्दं भजति कपटी दाम्भिकतया
जो व्यक्ति केवल श्री कृष्ण की ही भक्ति करते हैं बिना श्री राधारानी के, ऐसे कपटी व्यक्तियों के मैं कभी भी समीप नहीं जाऊँगा, यह मेरा प्रन है।
हे श्रीसरोवर सदा त्वयि
हे श्रीराधाकुण्ड मेरी स्वामिनी श्रीराधा जी अपने प्रियतम श्रीश्यामसुन्दर के साथ आपके तटवर्ती कुञ्ज में प्रेमोद्रेक में विविध क्रीड़ाएं करती रहती हैं। ह...
स्वप्नेऽपि किं सुमुखि ते चरणाम्बुजात
हे सुमुखि ! अहो ! कभी स्वप्न में भी मैं आपके चरणकमलों के सुगन्धित परागचूर्ण रूप विभूषण से अपने मस्तक को परम सुशोभित करके मस्तक के उत्तमांग-नाम को सार्...
मैं उन श्री राधा की आराधना करता हूं, जिनकी आंखें कमल समान हैं
मैं उन श्री राधा की आराधना करता हूं, जिनकी आंखें कमल समान हैं, मैं उन श्री राधा का स्मरण करता हूँ जिनकी मधुर मुस्कान है, और मैं उन श्री राधा का गुणगान...
लक्ष्मीर्यदङ्घ्रिकमलस्य नखाञ्चलस्य
हे स्वामिनी, लक्ष्मी देवी भी आपके चरणारविन्द के नखाग्र प्रान्त के सौन्दर्य का एक बिन्दु मात्र भी प्राप्त नहीं कर सकती है। यदि आप मुझे अपने रूप-लीलादि ...
यदा तव सरोवरं सरस-भृंगसंघोल्लसत्
हे प्रफुल्लित - कमलनयने ! जब से मैंने मधुर गुञ्जनकारी मधुकरों से शोभित, कमलसमूह से मनोहर और मधुरजल से पूर्ण आपके सरोवर ( राधाकुण्ड ) का दर्शन किया है,...
सदा राधाकृष्णोच्छलदतुल
मैं युग के समान अति दीर्घकाल पर्यन्त विरही होते हुए भी सदा श्री राधा कृष्ण के उल्लासयुक्त अतुलनीय लीलास्थल इस ब्रजधाम को त्यागकर पूर्ण एश्वर्य से दीप्...
त्वदलोकन-कालाहि
हे क्रीड़ा परायण स्वामिनी श्री राधे!, आपके दर्शन के अभाव में मैं काले सर्प के डंक से क्षण क्षण मरी जा रही हूँ। कृपया अपने श्री चरण कमल में संलग्न अलत...
यथा दुष्टत्वं मे
अरे मन! तू इस श्रीब्रज धाम में ऐसी दीनतामय व्याकुलता से श्रीगिरिधारी जी [श्री कृष्ण] का भजन कर, जिससे वे कृपा करके मुझ जैसे शठ का भी दुष्ट स्वभाव दूर ...
जित्वा पाशकखेलायामाच्छिद्य
हे दिव्यलीलामयि ! पाशक-क्रीड़ा में श्रीश्यामसुन्दर को हराकर, उनकी वंशी छुड़ाकर कब मेरी ओर फेंकोगी और मैं उसे छिपाकर सुरक्षित रख लूंगी ?
अनाराध्य राधापदाम्भोजयुग्ममाश्रित्य
जिसने श्री राधारानी के चरण रज की एक बार भी आराधना नहीं की, उनके चरण चिन्ह से आच्छादित श्री ब्रज धाम की एक बार भी शरण ग्रहण नहीं की, उनको नित्य लाड़ लड़ा...
यत्प्रान्तदेश लवलेश विघूर्णितेन
हे करुणामयि राधे! आप जब अपने नेत्रप्रान्त को लेश मात्र भी घुमाती हैं-(चञ्चल दृष्टि से इधर-उधर देखती हैं) तो कृष्ण-गजेन्द्र उसी क्षण दृढ़ बन्धन में आ ज...
न चानयत्र क्षेत्रे हरितनु
मैं एक क्षण के लिए भी किसी अन्य पवित्र धाम में नहीं रहूंगा, भले ही वह जगह में श्री कृष्ण की साक्षात अनुभूति क्यों न होती हो, भले ही वहां अत्यंत महान भ...