सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
मुख्यपृष्ठसंतश्री वल्लभाचार्य
सभी संत

जीवन चरित

ब्रज परंपरा के वैष्णव संत।

श्री श्री वल्लभाचार्य वाणी संग्रह

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श्री यमुनाष्टकं

मैं श्री यमुना जी को प्रणाम करता हूँ जो समस्त सिद्धि को प्रदान करने वाली हैं। श्री यमुना जी के छोर की रज श्री कृष्ण के चरण कमल के समान चमक रही है। श्र...

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चित्तोद्वेगं विधायापि हरिर्यद्यत्

यदि किसी कारण आपके चित्त में द्वेग उत्पन्न हो रहा है तो ऐसा मान कर कि श्रीहरि जो भी करेंगे वह अच्छा ही करेंगे, यह उनकी लीला मात्र है, चिंता को शीघ्र ...

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श्री युगलाष्टकम

कृष्णस्य द्रविणं राधा राधायाः द्रविणं हरिः। जीवनेन धने नित्यं राधाकृष्ण गतिर्मम॥ 2॥ श्री कृष्ण का जीवन धन राधा हैं, एवं श्री राधा का जीवन धन श्री कृष...

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गोकुले गोपिकानां च सर्वेषां व्रजवासिनाम्

भगवान कृष्ण मुझे वह रस कब देंगे जो गोकुल की गोपियों और ब्रज के समस्त वासियों को मिला था ?

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भक्तिवर्धिनी

बीजदाढ्‌र्यप्रकारस्तु गृहे स्थित्वा स्वधर्मतः। अव्यावृत्तो भजेत्कृष्णं पूजया श्रवणादिभिः॥ [2] घर में रहकर ही अपने कर्तव्य कर्मों का पालन करते हुए ही भ...

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अन्तःकरण मद्वाक्यं

हे अंतःकरण मेरी बात सावधानी पूर्वक सुन, वस्तुतः दोष रहित श्री कृष्ण से कोई अन्य देवता नहीं है।

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श्रीकृष्णरसविक्षिप्त मानसा रतिवर्जिताः

समस्त श्रोताओं में सर्वश्रेष्ठ वह है जिसका मन और हृदय सम्पूर्ण प्रकार से श्रीकृष्ण के प्रेममयी रस में डूबा हुआ है। वह केवल दिव्य प्रेम को स्वीकार करता...

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तस्मात्सर्वात्मना नित्यं श्रीकृष्णः शरणं मम

ऐसा महसूस करना चाहिए कि श्री कृष्ण हर जगह व्याप्त हैं एवं वे सभी की आत्मा हैं और निरंतर चिंतन करना चाहिए कि "मैं श्री कृष्ण की शरण में हूँ"। यह मेरा द...

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शिक्षापद्यानी

यदि तुम श्री कृष्ण से विमुख हो जाओगे तो कालिकाल के प्रभाव में रहने वाले तुम्हारा तन और मन समय के प्रवाह से तुम्हारा नाश कर देंगे ऐसा मेरा विश्वास है। ...

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सर्वदा सर्वभावेन भजनीयो

ब्रजेश्वर श्री कृष्ण को सर्व भाव से सर्वदा भजन करना चाहिए। यह ही तुम्हारा एकमात्र धर्म है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा धर्म नहीं है।

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यदि श्रीगोकुलाधीशो धृतः सर्वात्मना हृदि

हे मन, यदि तूने श्रीगोकुल के अधिपति श्री कृष्ण को सम्यक प्रकार से अपने हृदय में धारण कर लिया है, तो फिर लौकिक और वैदिक फलों की क्या आवश्यकता रह जाती ह...

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सिद्धान्तरहस्यम्

श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि की मध्य रात्रि में श्री कृष्ण मेरे सामने प्रकट हुए। अब मैं उन वचनों को प्रकट करूँगा जो उन्होंने कहा था। (1)...

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मधुराष्टकम्

करणं मधुरं तरणं मधुरं, हरणं मधुरं रमणं मधुरम्। वमितं मधुरं शमितं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥[5] आपके कार्य मधुर हैं, आपका तरण मधुर है, आपका चोरी ...

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नत्वा हरिं प्रवक्ष्यामि स्वसिद्धान्त विनिश्चयम्

श्री हरि के चरणों में प्रणाम करता हूँ एवं अब मैं अपने सिद्धांत को बताता हूँ। हर क्षण एवं हर कार्य करते हुए श्री कृष्ण की सेवा करो। सबसे उच्च कोटि की स...

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सर्वेषा प्रभुसम्बन्धो

सब कुछ भगवान कृष्ण से ही सम्बंधित है और उनसे कुछ भी अलग नहीं है। इसलिए, यदि आप ऐसी गतिविधियों (या कार्यों) में संलग्न हैं जो आपको लगता है कि उनसे संबं...

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सेवाकृतिर्गुरोराज्ञा बाधनं

गुरु की आज्ञा के अनुसार ही सेवा करनी चाहिए। परंतु यदि किसी कारणवश गुरु की आज्ञा के अनुसार सेवा न हो पाए तो उसे हरि की इच्छा ही समझना चाहिए एवं उन श्री...

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श्री कृष्णाश्रय

म्लेच्छाक्रांतेषु देशेषु पापैकनिलयेषु च। सत्पीड़ाव्यग्र लोकेषु कृष्ण एव गतिर्मम॥ [2] हे प्रभु ! देश में दुष्ट लोगों का भय व्याप्त है और देश में सभी लो...

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नवरत्नम्

जिसने स्वयं को श्री कृष्ण चरणों में आत्मनिवेदन कर दिया है उसे कदापि चिंता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि परम कृपालु भगवान अंगीकृत जीवों को लौकिक गति प्रदान ...

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अन्तःकरण प्रबोध

चाण्डाली चेद्राजपत्नि जाता राज्ञा च मानिता। कदाचिदपमानेऽपि मूलतः का क्षतिर्भवेत॥ [2] निम्न जाति की स्त्री के राजपत्नी और राजा से सम्मानित होने के बाद ...

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आत्मानंदसमुद्रस्थं कृष्णमेव विचिंतयेत्

जो जीव भक्ति भाव से श्री कृष्ण का चिंतन करता है वो अपने आनंद के समुद्र में रहता है। जो जीव सांसारिक लक्ष्य से कृष्ण की पूजा करते हैं, उन्हें हमेशा कठि...