श्रीमद भागवतम्
जीवन चरित
श्री श्रीमद भागवतम् वाणी संग्रह
तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां
श्री ब्रह्मा जी कहते हैं कि ब्रज के किसी भी निवासी की चरण रज मिल जाए एवं ब्रज में किसी भी देह में जन्म मिल जाए, परंतु मेरे मस्तक पर नित्य ही ब्रज गोकु...
जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि
हे प्यारे ! तुम्हारे जन्म के कारण वैकुण्ठ आदि लोकों से भी ब्रज की महिमा बढ गयी है। तभी तो सौन्दर्य और मृदुलता की देवी लक्ष्मीजी अपना निवास स्थान वैकुण...
पुण्या बत व्रजभुवो यदयं
सखि! सच पूछो तो, ब्रजभूमि ही परम पवित्र और घन्य है क्योंकि यहाँ यह पुरुषोत्तम मनुष्य के वेष में छिपकर रह रहे हैं। स्वयं देवादिदेव महादेव शंकर और श्री ...
सालोक्य-सार्ष्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमप्युत
भगवान् (श्रीकपिलदेव) कहते हैं - ‘मेरे प्रेमी भक्त, मेरी सेवा को छोड़कर, सालोक्य, सार्ष्टि , सामीप्य, सारूप्य और एकत्व (भगवान् में मिल जाना -ब्रह्मस्वर...
वृन्दावनं गोवर्धनं यमुनापुलिनानि च
हे परीक्षित, जब बलराम एवं कृष्ण ने वृंदावन, गोवर्धन एवं यमुना को निहारा, तब उन दोनों का मन प्रेम से परिपूर्ण हो उठा।
राजधानी तत: साभूत्सर्वयादवभूभुजाम्
मथुरा यदुवंश के राजाओं की राजधानी रही है। मथुरा का संबंध श्री कृष्ण से बहुत गहरा है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण यहाँ नित्य वास करते हैं।
वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिं
हे सखी, देवकी पुत्र कृष्ण के चरणकमलों का कोष पाकर वृन्दावन पृथ्वी की कीर्ति को फैला रहा है। जब मोर गोविन्द की वंशी सुनते हैं, तो वे मस्त होकर नाचने लग...
इत्युक्तस्तं परिक्रम्य प्रणम्य च नृपार्भक:
नारद जी भक्त ध्रुव से कहते हैं: “यह वही मधुवन है, जहां प्रभु श्री कृष्ण ने लीलाएँ कीं, जो लीलाएँ उनकी सम्पन्न हो चुकी हैं, उनका ध्यान करना, यह स्थान श...
असाम्हो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने
असाम्हो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। - श्रीमद भागवतम् (10.47.61) उद्धव कहते हैं — यदि मैं वृन्दावन में किसी झाड़, लता अथवा ...
पुन: पुन: स्मारयन्ति नन्दगोपसुतं बत
ब्रज का कण कण श्री कृष्ण चरणों से चिन्हित है, यह हमें नित्य ही श्री कृष्ण की याद दिलाता है। श्री कृष्ण को भला कोई ब्रज में कैसे भूल सकता है ?