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धनय वृनदावनं तेन भक्तिरनृत्ययित यत च - पदम् पुराण - भागवत माहात्म्य

वृन्दावन की भूमि धन्य है जहाँ भक्ति हर क्षण प्रेम विभोर होकर नृत्य करती है।

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अस्तंगच्छत्सूर्या शुशुक्षणौ - श्री विट्ठलनाथ जी, श्री स्वामीनीजी प्रार्थना (4)

हे श्री राधे,ऐसा मेरा सौभाग्य कब होगा कि मेरा दिन भर का दुःख अस्त होते हुए सूर्य के हवन कुंड अग्नि में भस्म हो जाये तथा आपको प्रिय लगने वाले प्रियतम की प्रेम वार्ता को आपको सुनाने से मेरा ब्रह्म यज्ञ ...

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श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी का जीवन परिचय

जन्म एवं बाल्यकाल: श्रीहरिव्यास देवाचार्य जी मथुरा में आदि गौर ब्राह्मण कुल में जन्में थे। उनका उपस्थिति काल 14वीं शताब्दी में माना जाता है। पर अधिकतर विद्वान उन्हें सोलहवीं शताब्दी के अंत और सत्रहवीं...

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कानन में रहे झलकि कैं - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (32)

श्री वृन्दावन में हित-युगल के मुख-चन्द्र की कांति निरंतर झिलमिलाती रहती है, जिसे सहज स्नेहमूर्ति सखियाँ चकोर की भाँति निरखकर अपने मन और प्राणों को शीतल करती हैं।

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लगन लगन सबही कहें - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस

सब साधक कहते हैं कि हमें प्रभु की साँचि लगन लगी है; परन्तु श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि साँचि लगन में तन-मन और और स्वयं का अस्तित्व स्वतः ही समर्पित हो जाता है।

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राधे रसिक सिरोमनि रानी - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (68)

श्री राधे रसिकों की सिरमौर रानी हैं। श्री राधा अदभुत प्रकार के रूप और रस का सागर हैं जो नित्य ही जनों को महा प्रेम सुख प्रदान करने वाली हैं। [1] इस नित्य विहार रूपी रस में नित्य मिलन है एक क्षण का भी...

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राधा माधव भैंट भई - श्री सूरदास, सूरसागर, द्वारिका चरित (50)

प्रस्तुत पद में श्री सूरदास जी, राधा माधव की मिलन लीला का वर्णन करते कहते हैं कि, "श्री राधा और श्री कृष्ण जब मिलते हैं (राधा कृष्ण बन जाते हैं और कृष्ण राधा बन जाती हैं ) तो उनके रूप एक समान हो जाते...

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जै जै मचों ब्रज में चहूँ ओर ते बोल रहे नर नारी जौ जै जै - श्री छबीले जी

ब्रजभूमि में चारों ओर नर-नारी उत्साह से पुकार रहे हैं—“जै-जै युगल सरकार की!” [1] समस्त देवतागण अपने-अपने विमानों से एवं ब्रह्मा-भगवान शंकर भी जै-जैकार कर रहे हैं। [2] भृगु, व्यास, पराशर जैसे मुनि और...

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डीठि हू कौ भार जानि देखत न डीठ भरि - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (47)

इस आशंका से ही कि मेरी दृष्टि का प्रिय पर भार न पड़े, प्रियतम श्रीलाल जी प्रिया को दृष्टि भर कर नहीं देखते हैं। सुकुमारी प्रिया, प्रियतम को नयन एवं प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। [1] उनका सहज माधुर्...

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हमारी निधि, श्री वृषभानु दुलार - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज,दैन्य माधुरी (93)

हमारी निधि तो एकमात्र वृषभानुनन्दिनी श्री राधिका जी हैं। [1] जिनकी भृकुटि – विलास को ब्रह्म श्रीकृष्ण भी नित्य देखते रहते हैं ( जिनकी भौहों के इशारे पर ब्रह्म भी दास बनकर चलता रहता है।) [2] ब्रज की ग...

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जब चितई कजरारे नैननि - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (45)

जब प्रिया ने अंजन-रञ्जित नेत्रों से प्रियतम की ओर दृष्टिपात किया, तो मनमोहन लाल प्रेम-विवश तो हुए ही वरन उनको चारो ओर से प्रेम रूपी कामदेवों ने घेर लिया। [1] तब तो प्रियतम सुंदरी प्रिया की मंद मुस्कान...

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राधा मेरी गती मति, राधा पद मेरी रति - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, ब्रज रस माधुरी

राधा मेरी गती मति, राधा पद मेरी रति - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, ब्रज रस माधुरी श्री राधा मेरे जीवन का अंतिम लक्ष्य है, जिन्होंने मेरे मन को पूर्ण रूप से लुभा लिया है। मेरा प्रेम केवल श्री राधा क...