Verses & Passages
38 itemsराधा मोहन मुख लगी
राधा के मन को मोहने वाले मोहन श्री कृष्ण के मुख से मुरली दिन-रात लगी रहती है; वह उनके अधर-रस को नित्य पीती रहती है और सदा ‘राधा-राधा’ गान करती है, जि...
राधा रसिक सँजीवनी
श्री राधा ही रसिकों के लिए प्राण-दायिनी संजीवनी के समान हैं और वे ही प्रियतम लाल (श्री कृष्ण) का जीवन-प्राण हैं। ब्रज के वनों की प्रत्येक लता और तमाल ...
रँगीली जोरी की बलि जाँव
श्री आनंदघन कह रहे है "ललित रूप - गुण की राशि, रँगीली जोरी श्री श्यामा कुंजबिहारी की बलिहारी है, जो सदैव यमुना किनारे कदम्ब लताओं के वन में विहार पराय...
राधा माधौ बिहरै बन मैं
श्री आनंदघन कह रहे हैं "श्री वृन्दावन में यमुना तट पर हरी भरी कुंजों में श्री राधा माधव मन में फुले फुले विचरण करते हैं।" केली प्रेम क्रीड़ा सुख में र...
बृंदावन नीको लागै है
श्री आनंदघन कह रहे है "श्री धाम वृन्दावन, जो सजल है, सघन है, श्री श्यामसुंदर के प्रेम का बाग है, मुझे अति प्रिय है। श्री यमुना के किनारे श्री श्यामसु...
मोहि दीजै जू ब्रजवास
श्री आनंदघन कह रहे है "हे नन्द महाराज तथा वृषभानु राय जी, कृपया मुझे ब्रजवास प्रदान कीजिये, मेरे ह्रदय की इस अभिलाषा को पूर्ण कीजिये। [1] श्री राधि...
छबीलो रसिकराय नवरंग
श्री आनंदघन कह रहे हैं "नित्य नवरंग रसिक शिरोमणि श्री श्यामसुंदर छबीले हैं। सुन्दर हाथों में सुन्दर मुरली धारण किये हुए श्री मनमोहन के समस्त अंग अति ...
राधा राधा रटि राधा राधा रटि मेरी
श्री आनंदघन कह रहे हैं "राधा राधा रटते रटते मेरी रसना रसीली बन गयी है, एवं जितना अधिक इस अद्भुत रस का पान करता हूँ, उतनी ही अधिक नवीन प्यास प्रकट हो र...
रसिकनी राधा राधा है
श्री आनंदघन कह रहे है "रस प्रदान करनेवाली रस की मूर्तिमान स्वरुप, मूल रूप से रस स्वरुप, रसिकनी केवल श्री राधा हैं, जिनसे मिलने के लिए श्री श्यामसुंदर...
जो तुम बनावौगे सोई बनिहै
श्री आनंदघन कह रहे है "हे ब्रज के नायक श्री कृष्ण, मेरा जो भी भाग्य आप बनाओगे वही होगा, मेरे सोचने से कहाँ कुछ होगा। अब तक आपने मेरी बहुत अच्छी बनायी ...
कृपा करैं ब्रजनाथ जौ
कृपा करैं ब्रजनाथ जौ, ब्रजदरसन कै नैंन। या ब्रजबन की माधुरी, तौ परसै उर-एन॥ - श्री आनंदघन, घनानंद ग्रंथावली, ब्रजविलास (7) यदि ब्रजनाथ कृपा करें, तभ...
जमुना कूल सुहावनो, ललित बलित तरु-बेलि
श्री यमुना जी का वह सुंदर किनारा, जहाँ अत्यंत मनोहर वृक्ष और लताएँ एक-दूसरे से लिपटी हुई हैं, वह स्थान साक्षात् श्री राधा-रमण की परम मधुर और रसमय क्री...
हीन भएँ जल मीन अधीन
जल से अलग होकर मछली बहुत पीड़ित होती है, पर क्या उसका यह कष्ट मेरे कष्ट की बराबरी कर सकता है? [1] अपने प्रिय जल का संग छोड़कर, और उसे कलंकित कर, वह क...
मोहन मदनगुपाल को, मोहन यह ब्रज देस
मदनगोपाल का यह मनोहर ब्रजदेश परम मंगलकारी और उदार है, जहाँ नंदनंदन श्री कृष्ण अपनी दिव्य लीला से संपूर्ण ब्रज को शोभायमान करते हुए विराजमान हैं।
प्रेमरंग-रस-रगमगी, सुंदर ब्रजबन-भूमि
ब्रज-वृन्दावन की यह सुंदर भूमि प्रेम के रंगों और दिव्य रस से पूरी तरह सराबोर है। यहाँ ब्रज के जीवन-प्राण, आनंद के मेघ (श्री कृष्ण), नित्य-निरंतर झूमते...
श्रीब्रजमोहन -माधुरी,रही नैन-मन छाय
ब्रज में मोहन श्रीकृष्ण की माधुरी नयनों और मन में नित्य छाई रहती है। वे ऐसा अद्भुत रस बरसाते हैं कि जितना पान किया जाए, उतनी ही प्यास बढ़ती जाती है; त...
गुरनि बतायौ राधा मोहन हूँ गायौ
रसिक गुरुओं ने बताया है कि श्री धाम वृंदावन अगाध रस का धाम है जहां निवास करके श्री प्रिया प्रियतम का यशोगान करना चाहिए। [1] इस भूमंडल पर स्थित श्री ध...
ब्रजमोहन ब्रज मैं बसै, नित ब्रजमंगल रूप
ब्रज को मोहित करने वाले श्री कृष्ण (ब्रजमोहन) सदैव ब्रज में ही निवास करते हैं और उनका स्वरूप साक्षात् ब्रज का मंगल करने वाला है। वे ब्रज के भीतर और बा...
रसिक-सिरोमनि सुजान सुधानिधि हू की
रसिक शिरोमणि श्री कृष्ण की रसना को भी रस में भिगाने वाला राधा नाम रसीला रस धाम है। [1] जिस प्रकार चातक को स्वाति की बूँद को ही ग्रहण करने की अभिलाषा ...
ब्रजबिलास रसरीति को
ब्रज-विलास की रस-रीति का वर्णन भला कैसे संभव है, जहाँ पूर्ण-कला-निधान भगवान श्रीकृष्णचंद्र ने अपनी दिव्य क्रीड़ाओं से उस भूमि को पावन किया है?
दोऊ मिलि एकै भए
श्रीराधा-कृष्ण की यह दिव्य रसीली जोड़ी प्रेम के अतिरेक में मिलकर पूर्णतः एक हो गई है। मेरी यही एकमात्र अभिलाषा है कि यमुना के पावन तट पर, सघन कुंजों और...
कमला तप साधि अराधति है
श्री लक्ष्मीजी कठोर तपस्या कर श्रीकृष्ण की आराधना करती हैं, मानो अभिलाषा रूपी महोदधि (समुद्र) में अवगाहन करने के लिए तपस्या कर रही हों। [1] श्रीकृष्ण...
मधुर केलिरस-झेलि सों
प्रिया प्रीतम की केली लीलाओं के मधुर रस में डूबकर, रसना दिव्य "राधा" नाम का अति अद्भुत आनंद लेती है, जो मनमोहक वाणी रूपी लता का ऐसा सुफल (सुंदर फल) है...
सब-सुख-सोभा-मूल बृंदावन धन मेरे
श्री आनंदघन कह रहे है "समस्त सुख तथा शोभा का मूल श्री वृन्दावन धाम ही मेरा जीवन धन है, जहाँ नित्य श्री राधा मोहन का नाम गाऊंगा और प्रातः संध्या श्री य...
पहचानै हरि कौन, मो से अनपहचान कों
हे हरि! मुझ जैसे अपरिचित को कौन पहचान सकता है। जिस प्रकार आपके नेत्रों के बीच कृपा रूपी कान छिपे हुए हैं, उसी प्रकार मेरे मौन में पुकार छुपी हुई है। (...
अति सुधौ सनेह को मारग है
प्रेम का मार्ग अत्यंत सीधा है, जहाँ थोड़ी-सी भी चालाकी के साथ चलना असंभव है। [1] इस मार्ग में सच्चाई से ही चला जाता है और अपने आप को सदा न्योछावर करक...
ब्रजबन लीला माधुरी निरविधि रस कौ सार
ब्रजवन की लीलाओं की मधुरता अनंत रस का सार है। रसिक शिरोमणि श्री राधा-कृष्ण की कृपा से मुझे प्रेम का आधार प्राप्त हुआ है।
ब्रजमोहन उर अवनि में राधा-सुपद-विहार
श्री कृष्ण के हृदय रूपी धाम में श्री राधा के सुंदर चरण सदा विहार करते हैं जिससे उनका रोम रोम आनंद से भीग जाता है।
राधा रास-सिरोमनी राधा केलि-कुलीन
श्रीराधा रास की शिरोमणि और केलि-लीला की परम कुलीन स्वरूपा हैं। वे समस्त कलाओं से परिपूर्ण, स्वयं रसस्वरूपिणी तथा प्रेम में पूर्णतः लीन रहने वाली प्रेम...
ललित फागु रचना रची
परम मनोहर फाग (होली-विलास) की रचना रची गई है, और मधुर बसंत ऋतु आनंदपूर्वक शोभित हो रही है। माधव की प्रियतमा श्री राधा जू की जय हो, वनमाली प्रियतम श्री...
मेंहदी रची कुंवरि के पाइन
श्री राधा के चरण कमलों में मेहँदी रची है। उनके नख कोमल एवं सुन्दर हैं जो उनके श्री चरणों की शोभा को विविध प्रकार से बढ़ा रही है। [1] श्री राधा के चरण...
अब कछु बाधा नाहिं रही
अब कोई बाधा नहीं रह गयी है, क्यूँकि अब मुझे मदन गोपाल मिल गए हैं, सारे साधन सफल हो गए हैं। [1] मेरा रोम रोम अति हर्षित हो रहा है, जीवन सफल हो गया है। ...
राधा मेरे प्राण है
श्री राधा मेरी प्राण हैं और गोपाल श्री राधा के प्राण हैं; अतः मेरी श्वास नित्य ही राधा-मोहन (युगल नाम) की माला जपती रहती है।
राधा राधा नाम को
श्री राधा नाम के रटन से जिह्वा को महास्वाद की अनुभूति होती है; इसलिए इस ग्रन्थ के इस प्रबंध को भी “प्रियाप्रसाद” नाम प्राप्त हुआ है, जिसमें एकमात्र श्...
कहिबो सुनिबो समझिबो
जीवन में जो कुछ भी कहना, सुनना और समझना हो, वह केवल श्री राधा के विषय में ही होना चाहिए। जो भाग्यशाली जीव इस संसार को पूरी तरह भूलकर केवल श्री राधा के...
जो कछु है सो राधिका
मुझे जो भी चाह है, वह केवल श्री राधिका जी ही हैं—और कुछ नहीं। श्री राधा-चरण-रति ही मेरा प्रण और प्रतिज्ञा है, उसे निभाने का उत्तरदायित्व भी स्वयं श्री...
राधा मेरी संपदा
श्री राधा ही मेरे जीवन की एकमात्र सम्पदा और मूल आधार हैं; मेरा रोम-रोम हर्षित होकर प्रेमपूर्वक ‘राधा-राधा’ जपता है।
मेरे मन दृग रीझि की
मेरे मन की इच्छा को श्री राधारानी तुरंत जान लेती हैं, और श्री राधारानी के हृदय की बात भी मेरे हृदय में तुरंत स्फुरित हो जाती है।