रसिक वाणी
Verses & Passages
16 itemsकाया शुद्ध होत जब ब्रज रज उड़ि अंग लगे
शरीर की शुद्धि तब होती है जब ब्रज की पवित्र रज उड़कर हमारे अंगों पर लगती है। धन की शुद्धि तब होती है जब कोई श्री कृष्ण की सेवा में अपना धन समर्पित करता...
काहु को भरोसो है शेष को दिनेश को
किसी को शेषनाग पर भरोसा है, कुछ को भगवान सूर्य पर भरोसा है। कुछ को भगवान शिव पर भरोसा है, जो वरदान देने के लिए प्रसिद्ध हैं। [1] किसी को देवी पार्वत...
जित देखौं तित स्याममई है
एक ब्रज की सखी जो हर जगह श्याम सुंदर को ही निहार रही है, वह कहती है: मैं जिस भी दिशा में देखती हूं, मुझे सब कुछ श्याम रँग ही दिखाई देता है। कुंज और ...
पावन वृन्दा विपिन की महिमा कही न जाय
पावन श्री धाम वृंदावन की महिमा का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। इस भूमि की पवित्र रज के स्पर्श से पापी जनों का भी उद्धार हो जाता है। [1] पापात्...
मेरे एक राधा नाम आधार
श्री राधा नाम ही मेरे जीवन का आधार है। कुछ लोग निराकार ब्रह्म के चिंतन का अनुसरण करते हैं। [1] कुछ लोग भगवान विष्णु और भगवान शिव की भक्ति में संलग्न ...
तनक हँस हेरो मेरी ओर
श्री कृष्ण श्री राधा से कहते हैं कि हे राधे, मेरी ओर थोड़ा सा देख कर मुस्कुरा दो। मैं तुम्हारी ओर लगातार देख रहा हूँ और तुम मेरी ओर थोड़ा भी नहीं देख ...
चरण कमल बन्दौं प्यारी के
मैं श्री राधा के चरण कमलों की वंदना करता हूँ, जो रसिक जनों की प्राण नाथ हैं एवं जिनका धाम बरसाना है। [1] कीरति दुलारी श्री राधा के जो चरणकमल सखियाँ...
बरसानौ गाम निज धाम
बरसाना गाँव हमारी श्री प्यारीजी, श्री राधा का निज धाम है। हम उनके निज जनों की सेवा करते हैं। [1] हमें केवल इसी भूमि से काम है, और "राधे राधे" नाम ह...
रे मन, झूठी जग की प्रीत
अरे मन, इस संसार का प्रेम झूठा है। तू तो केवल श्री राधावल्लभ से ही अब अनन्य प्रेम कर जो तेरे सच्चे मित्र हैं। [1] कोई भी वास्तव में तेरा अपना नहीं है...
वसिये श्री वृन्दावन धाम
श्री वृन्दावन-धाम में वास करो — ऐसा वास जहाँ “श्री राधे–राधे” नाम को बोलने से शरीर का रोम-रोम पुलकित हो उठे। [1] जो कोई श्री राधा-कृष्ण को त्यागकर कि...
जप नहीं, तप नहीं, ज्ञान नहीं, ध्यान नहीं
हे प्रभु, न मेरे पास जप का बल है, न तप, ज्ञान, ध्यान एवं अन्य किसी साधन का। मेरा बल तो केवल आपका नाम है। [1] चाहे सारा जग क्यों न रूठा करे, मुझे तो ब...
बाँकी चारु चन्द्रिका
श्री राधा के सिर पर सुंदर चंद्रिका विराजमान है, उनके माथे पर सुन्दर चंदन का लेप है। उनकी भौहें चंचल एवं आकर्षक हैं और उसकी आँखों अत्यंत तिरछी एवं मोहि...
यह रस ब्रह्म लोक पातालै अवनिहूँ दरसत नाहीं
यह वह अद्भुत रस है, जो न तो ब्रह्मलोक में मिलता है और न ही पाताललोक में; इस दिव्य वृन्दावन रस की प्राप्ति के लिए तो वैकुण्ठवासी भी लालायित रहते हैं। [...
मो निरधनि कौ धन गिरिधारी
मुझ अकिंचन की एकमात्र पूँजी मेरे गिरिधारी ही हैं। मेरे चित्त को हरने वाले वे आनंदकंद बिहारी जी मेरे जीवन-प्रांगण के शीतल चंद्रमा के समान हैं। [1] उनक...
मोरकुटी और दान मान गढ़
बरसाना के दिव्य स्थानों जैसे मोरकुटी, दानगढ़, मानगढ़ और विलासगढ़ आदि में प्रेमपूर्वक विचरण कर, परमानंद को प्राप्त करना चाहिए। गह्वर वन की लताओं की मध...
कहि न जाय मुखसौं कछू स्याम-प्रेम की बात
श्याम का यह प्रेम ऐसा है जिसे मुख से कहना असम्भव है। आकाश, जल, पृथ्वी, चल-अचल जीव सभी श्याम के रंग में रंगे हुए प्रतीत होते हैं। [1] न अब मैं रचयिता ...