Verses & Passages
7 itemsसंयोगस्य वियोगस्य
जहां संयोग और वियोग का निश्चय ही न हो सके, इन दोनों से भिन्न स्थिति जहां हो, और दोनों (संयोग एवं वियोग) जहां एक रूप होकर रहते हों, वही अद्बुत रस नित्य...
तन्नामांकित धामेषु सम्बन्धानुगतेषुच
श्री राधा नाम से अंकित धाम में तथा उनसे सम्बन्धित किसी भी स्थान पर जो श्रीराधा की लीलाओं के उद्दीपक हो, निवास करना सिद्धिप्रद होता है।
नापेक्षते च या शास्त्रं प्रेमैकप्रचुरा भवेत्
श्री राधा प्रेम की विशुद्ध मूर्ति हैं जो शास्त्रों से परे हैं तथा वे अपने अनन्य भक्त श्री कृष्ण एवं अन्य सखियों के हृदय में नित्य विराजमान रहती हैं।
कृष्ण: सख्यश्च राधाया: भक्ता:
श्री राधा की सेवा, एवं वंदना उसी भाव से करना चाहिए जिस भाव से श्री कृष्ण एवं उनके चरणों के आश्रित अनन्य भक्त ललिता आदि करते हैं।
अद्यैव शरणापन्ने तथा श्री ललितादिषु
जो जीव श्री राधा की शरण में अभी तुरंत ही आया है वह भी उनको उतना ही प्रिय है, जितने कि श्रीकृष्ण और ललितादि। श्री राधा की दृष्टि में दोनों में अणुमात्र...
एवं सिद्धो निर्विकल्पो रतिरुपो रसोवने
श्री राधा का नित्य विहार सुंदर वृंदावन धाम में ही होता है, अत: वहाँ का वास सर्वोपरि है। वहीं पर कृष्ण और लालितादिक के ह्रदय में नित्य सिद्ध निर्विकल्प...
कटाक्ष दृक निपातेन
श्री राधा की केवल एक तिरछी कटाक्ष में ऐसा अद्भुत जादू है कि उसको देखने वाले श्रीकृष्ण और उनके अनन्य भक्तों के हृदय और आत्मा पूरी तरह से बिंध जाते हैं।...