Verses & Passages
7 itemsन याति तृप्ति शतशोथ घुष्टं
जिस वृषभानुपुरी [बरसाना] का नाम देव समूह द्वारा वन्दनीय है, जिस पुरी के नाम के सैकड़ों (अनन्त) बार उच्चारण को श्रीकृष्ण सावधानीपूर्वक अपने कानों से पु...
न मन्येहं लोकं न बहु
मैं न लोक की और न वेद की बताई अनेक विधियों को मानता हूँ और न ही निपुण साधु-संतों की श्लाघ्य शुद्ध और सुखद हरि भक्ति को। परन्तु मैं तो वन भूमि में सदा ...
सखीवृंदवृता राधा रराज वर गह्वरे
परम रमणीय गह्वरवन में सखी-समूह से आवृत श्रीराधा ठीक उसी प्रकार सुशोभित हो रही हैं, जैसे तारागणों से आवृत (घिरा हुआ) शरद् ऋतु का पूर्ण चन्द्र आकाश में ...
स्वकरे सितचामरन्दधद्
प्राणवल्लभा श्रीराधा जी मणिजड़ित श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हैं, प्रियतम अपने हाथ में शुक्लवर्ण चँवर को लेकर अनुरागपूर्ण भाव से स्वामिनीजू की सेवा में लगे...
त्वं वनराज ! किशोरीचरण द्वन्द्व
हे वनराज ! किशोरी जू के युगल चरणों का दर्शन मुझे भी करा दो, जो ‘चरण’ घनश्याम श्रीकृष्ण के हृदय में विद्यमान ताप को हरण करने वाले हैं।
किं कार्यं वत राधे
[श्री राधा के प्रति ललिता जी का प्रेम] ललिता कह रही हैं – हे श्रीराधे ! अब आप ही बतायें, वह नीलमणि श्रीकृष्ण आपकी रूप- माधुरी पर अतिशय आसक्त हैं, मैं ...
वपुर्मनो वागसवस्त्वयि
श्रीकृष्णचन्द्र प्रियाजी से कह रहे हैं – हे प्रिये ! मेरा शरीर, मन, वाणी एवं प्राण आप में ही हैं, आप निरन्तर मेरे द्वारा नितरां एकमात्र वाञ्छनीय हो अर...