SaintsBooksRagasShlokasStrotrasPoems
HomeGranthasश्री वृंदावन माधुरी
All Books
Sacred Scripture

श्री वृंदावन माधुरी

Verses & Passages

14 items
general

श्री वृंदावन माधुरी कैसे कैं कहि जाइ

श्री वृन्दावन की माधुरी का वर्णन किस प्रकार किया जाए? जिसका वर्णन करते-करते सहस्रमुखी शेषनाग भी थक गए और श्री ब्रह्मा जी भी उसका पार न पा सके।

general

चारि वेद षदशास्त्र, अष्टादश जु पुरान

चारों वेदों, छहों शास्त्रों और अठारहों पुराणों के समस्त सार का भी सार यदि कुछ है, तो वह श्री वृन्दावन का ध्यान ही है।

general

कोटि कोटि सुकदेव से, कोटि कोटि जयदेव

करोड़ों श्री शुकदेव जी और करोड़ों श्री जयदेव जी जैसे महापुरुष भी यदि नित्य नवीन श्री धाम वृन्दावन के गुणों का वर्णन करें, तो भी वे उनके रहस्य (भेद) को...

general

कोटिक तीरथ न्हाइप

चाहे कोटि-कोटि तीर्थों में स्नान करो और चाहे करोड़ों उपाय कर लो, परन्तु श्री राधा की सहचरी बनकर ही वृन्दावन का पूर्ण रस प्राप्त होता है।

general

जो कदाचितन ना बसै, तौ निज मनहिं बसाय

यदि किसी कारणवश शरीर से (वृन्दावन में) वास न हो सके, तो अपने मन को ही वहाँ बसा लेना चाहिए। महान कवियों और संतों का कहना है कि इसमें लेशमात्र भी झूठ नह...

general

कोटि कोटि वैकुंठ की, प्रभुताइ धौं कौन

करोड़ों-करोड़ों वैकुंठोंकी प्रभुता भी जिसके समक्ष हेय प्रतीत होती है, ऐसा श्री धाम वृन्दावन ही रसिकों का साक्षात् रस-स्वरूप निवास-स्थल है।

general

वृंदावन यश सुनन की, जाकैं रुचि नहिं होइ

जिस व्यक्ति को वृंदावन की महिमा सुनने में रुचि नहीं होती, उसका संग तुरंत छोड़ देना चाहिए, क्योंकि ऐसे व्यक्ति का संग करना ही महत्त अपराध है जो आध्यात्...

general

आदि अंत जाको नहीं, माया कों न प्रवेश

जिसका न आदि है और न अंत, जहाँ माया का प्रवेश भी नहीं होता—वही श्री धाम वृन्दावन इस पृथ्वी पर प्रकट होकर विराजमान है।

general

श्री वृंदावन महातम, समझि लेहु मन मित्त

हे मेरे मन-मित्र! तू श्री वृन्दावन के महात्म्य को भली-भाँति समझ ले। यह ऐसा मंगलमय धाम है कि स्वयं श्री हरि भी इसे मंगलरूप जानकर निरंतर इसकी वंदना करते...

general

वृंदावन मैं रहन की, ऐसि रहैं मन मांहि

मन में ऐसा अटल संकल्प रखकर श्री वृंदावन में निवास करना चाहिए कि चाहे शरीर खंड-खंड हो जाए, फिर भी इस पावन धाम का त्याग किसी भी परिस्थिति में न किया जाए...

general

वृंदावन को नाम सुनि, जिनकें हियैं हुलास

“श्री वृंदावन” का नाम सुनते ही जिनका हृदय प्रेम से उल्लसित हो जाता है, ऐसे महान रसिक संतों का संग करना ही सबसे उत्तम है।

general

ऐसौ वृंदाविपिन है, सर्वस रस को सार

यह श्री वृन्दावन ऐसा दिव्य और अनूठा धाम है, जहाँ समस्त रसों का सार—प्रिया-प्रियतम का नित्य विहार रस—हर क्षण बरसता रहता है।

general

ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि

श्री वृन्दावन-धाम की रज की ब्रह्मादिक भी वांछा करते हैं। श्री राधा-महारानी की कृपा के बिना, इस वृन्दावन की लीला का तनिक भी ध्यान-मात्र भी किसी के हृदय...

general

उपमा वृंदाविपिन की, देवे को नहिं ओक

श्री वृन्दावन धाम, जहाँ श्री श्यामा-श्याम नित्य-विहार-परायण हैं, उस नित्य धाम की उपमा किसी से भी देना असम्भव है; जिसकी एक कण-मात्र की सुन्दरता से ही स...