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राधा पुरः स्फुरति पश्चिमतश्च राधा
श्री निकुंज बिहारी निकुंज देखकर बोलते हैं - हा, यह क्या है! मेरे आगे राधा, मेरे पीछे राधा, मेरे बायीं ओर मेरी सेव्य राधा, मेरे दाहिनी ओर राधा, इस पृथ्...
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त्वद्वार्तोत्तर गीतगुम्फितमुखो
ललिता - हे राधे! श्रीकृष्ण की वंशी सदा तुम्हारे ही चरित्र का गान करती रहती है, वे तुम्हारी वेश-रचना के योग्य ही समस्त शिल्प क्रिया करते रहते हैं, समस्...
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पौर्णमासी-मयापि मोदकवृन्ददाना
पौर्णमासी जी कहती हैं - मैं लड्डू बाँटने के बहाने वृन्दावन जाती हूँ और वहाँ जाकर 'राधा'- इन दो मंगलमय अक्षरों के माधुर्य से कृष्ण के कानों को आनन्दित ...