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Sacred Scripture

अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

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दुःख दिखावत लाडिली

श्री किशोरी जी अपने को हस्त-पल्लवों से ढक लेती हैं। जब लालजी अत्यन्त अधीर होकर उनके सामने ‘हा-हा’ करते हुए मानो उनके हाथ का खिलौना बन जाते हैं—जैसे व...

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काया कुंज निकुंज मन

भगवतरसिकजी कहते हैं कि रसिक की काया ही कुंज-वन है, उसका मन ही निकुंज-महल, उसके नयन ही इस निकुंज-महल के मनोरम झरोखे अथवा द्वार हैं, और उसका हृदय ही वह ...

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सुरत सरोवर, समर जल, उठत कटाच्छ तरंग

इस नित्य-विहार के सरोवर में विशुद्ध प्रेममयी केलि का रस भरा है। इसमें कटाक्षों की तरंगें उठ रही हैं और अद्भुत रंग के अठारह कमल खिले हुए हैं। किशोरीजी ...

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दोऊ कानन लगि कहैं चुंबन देहिं अँकोर

(नित्यविहार-रत श्यामाश्याम की परिचर्या में अवस्थित श्रीभगवतअलि जी कहती हैं कि नित्यविहार की स्थिति में अधीर हुए) प्रिया-प्रियतम मेरे कानों से लग-लगकर ...

shloka

रूप-सरोवर लाडिली फूले सहज सरोज

हमारी लाडिलीजी (श्री राधा) साक्षात् रूप-सौंदर्य का अथाह सरोवर हैं, जिसमें उनके विभिन्न अंग — दो हस्तकमल, दो चरण कमल, एक नाभि कमल, दो नयन कमल, एक मुख क...

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जीव ईस मिली दोई

जब जीव और ईश्वर—दोनों अपने नाम, रूप और गुण-भेदों को त्यागकर जल और शक्कर के मिश्रण (शरबत) की भाँति एकरूप हो जाते हैं, तब वह रसिक कहलाने लगते हैं।

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कुंज बिहारिनि लाडिली

श्री भगवत रसिक कहते हैं कि रसिकों की यह गौर-श्यामल वर्ण वाली जुगल जोड़ी अर्थात् श्री राधा–कृष्ण सदैव मेरे हृदय में विराजमान रहते हैं।