ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
125 itemsपरा भक्ति याको कहैं
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि 'परा भक्ति' उसे कहते हैं जिसमें भक्त को जहाँ-तहाँ, सर्वत्र केवल अपने प्रियतम श्यामसुंदर के ही दर्शन होते हैं। यही वह...
हिरण्याक्ष जगमें विदित
मृत्यु एक अटल सत्य है, जिसके आगे किसी की नहीं चलती; क्योंकि हिरण्याक्ष जैसा विख्यात राक्षस और हिरण्यकशिपु जैसा बलवान असुर भी एक क्षण में काल के चक्र म...
बात बनावै ज्ञान की
कलियुग के चमत्कार तो देखो—बातें तो ज्ञान की करते हैं, परन्तु भोगों में आसक्त होकर ललचाते रहते हैं।
पुण्य पाठ पूजा प्रगट
यदि अहंकार सहित पुण्य, पूजा, पाठ या कोई भी साधन किया जाए, तो ठाकुर जी उससे प्रसन्न नहीं होते। वे चतुर-शिरोमणि हैं—उन्हें छल या आडम्बर से मूर्ख नहीं बन...
विद्यावन्त स्वरूप गुण
ज्ञान-सम्पन्नता, रूप, गुण, पुत्र, पत्नी आदि समस्त सांसारिक सुख श्री राधा-कृष्ण की भक्ति के बिना रोग के समान हैं।
लगन लगन सबही कहें
सब साधक कहते हैं कि हमें प्रभु की साँचि लगन लगी है; परन्तु श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि साँचि लगन में तन-मन और और स्वयं का अस्तित्व स्वतः ही समर्...
हाथ जोरि ठाढ़ो रह्यो
जिसके सन्मुख काल भी हाथ जोड़कर खड़ा होता है, ऐसे बली (शक्तिशाली) भी मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं।
नारायण व्रज भूमिकूं
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि वृन्दावन की भूमि समस्त देवताओं द्वारा भी वंदनीय है, जिसे वे अपने मस्तक से लगाकर रखते हैं; जहाँ स्वयं गोपेश्वर भगवान् शं...
तात मात त्रिय भ्रात सुत
चाहे पिता, माता, पत्नी, भाई-बंधु, पुत्र और समस्त परिवार ही क्यों न हों; पर वास्तव में अपना वही है, जिसे श्रीहरि से अनन्य प्रेम है।
नारायण बिन बोध के
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि बिना भक्ति के, एक विद्वान पंडित भी पशु के समान ही है। उस शुष्क ज्ञानी से तो वह मूर्ख व्यक्ति कहीं श्रेष्ठ है, जो बिन...
अपनो साखी आप तू
हे जीव! अपना साक्षी तू स्वयं ही है; मन में इस बात का विचार कर और अपने दोषों को पहचानकर उन्हें तुरंत सुधार।
जे रसिकन उर नित बसें
जिन रसिकों के हृदय में आगम-निगम का सारस्वरूप यह युगल-दम्पति का नित्य-विहार-रस बसा हुआ है, ऐसे रसिकों के श्रीचरणों में बारम्बार बलिहार है।
भीतर सों मैलो हियो
जिसका हृदय भीतर से विकारों और छल-कपट से मलिन है, परंतु बाहर से उसने अनेक सुंदर और धार्मिक रूप धारण कर रखे हैं, उससे तो वह कौआ कहीं श्रेष्ठ है जो भीतर ...
ज्ञान कथा सीखी घनी
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि बहुत से लोगों ने ज्ञान की बड़ी-बड़ी कथाएँ सीख ली हैं और वे अत्यंत गूढ़ एवं जटिल प्रश्न भी करते हैं। परंतु, यदि हृदय ...
नर संसारी लगन में
संसारी जीव संसार की लगन में ही करोड़ों प्रकार के सुख-दुःख सहते रहते हैं, फिर भी उससे लगे रहते हैं; परन्तु यदि हरि-प्रेम ही लक्ष्य हो, तो उसके समक्ष जो...
नारायण होवै भलें
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि जब भगवान श्री हरि से प्रीति लगा ली, तब अब जो कुछ होना है, सो हो जाए—फिर क्यों सोच-विचार करता है? [अर्थात् जो कुछ हो...
दृग सों नाव निहार के
जो साधक सत्संग के प्रभाव से इस मिथ्या संसार से पार कराने वाली नौका अर्थात् श्री राधा-कृष्ण की शरणागति को देख कर भी अपने अभिमान के शिखर पर चढ़ जाता है ...
नारायण यह प्रेम सुख
यह प्रेम-सुख अत्यंत अद्भुत है। इसका वाणी से वर्णन करना उतना ही असम्भव है, जितना कि कोई गूंगा यदि गुड़ खाए तो उसके स्वाद का वर्णन नहीं कर सकता।
नारायण तू भजन कर
हे मन! तू तो केवल भजन कर; क्रूर जीव तेरा क्या बिगाड़ लेंगे? संसारी स्तुति और निंदा दोनों ही निरर्थक हैं—अन्ततः दोनों के सिर धूल ही पड़ती है। केवल भजन ...
नारायण जप योग तप
जप, योग और तपस्या की अपेक्षा प्रेम परम प्रवीण और श्रेष्ठ है, क्योंकि वही नित्य श्री हरि को प्रेमी के अधीन रखता है।
नारायण या जगत में
इस जगत (संसार) में दो ही सार वस्तुएँ हैं—एक तो सबसे मीठा बोलना (प्रेमपूर्वक बात करना) और दूसरा परोपकार करना।
कह्यो चहै कछु कहत कछु
जिसे प्रेम का रंग लग जाता है, वह मानो बावरा हो जाता है—कहना कुछ चाहता है और मुख से कुछ और ही निकल जाता है; नयनों से प्रेम के आँसू निरंतर झलकते रहते है...
नारायण हरि भजन में
हे मन! यदि तू हरि-भजन में देर करेगा (अर्थात् उसे टालता रहेगा), तो कौन जानता है कि इस लापरवाही में तेरे प्राण रहें या न रहें।
चटक मटक नित छैल बन
श्री राधा-कृष्ण के चरणों को भूलकर जो व्यक्ति अपने शरीर का सुन्दर श्रृंगार कर मदमस्त चाल से चारों ओर देखते हुए घूमता फिरता है, वह यह भी भूल जाता है कि ...
नारायण जाको हियो, बिंध्यो, श्याम दृग बान
जिसके हृदय को श्री श्यामसुंदर के तिरछे कटाक्ष-बाण ने भेद दिया हो, वह बाह्य दृष्टि से भले ही संसार को जीवित प्रतीत हो, पर भीतर से वह सांसारिक चेतना से ...
तनक बड़ाई पाय के, मन में अधिक गरूर
थोड़ा सा सम्मान पा कर उपासक को अहंकार नहीं करना चाहिए, इससे अतिदुर्लभ भगवत मार्ग बाधित हो जाता है।
लखी न जिन छबि श्याम की
जिसने पलभर के लिए भी श्यामसुन्दर की छवि का दर्शन नहीं किया और न ही क्षणभर उनका ध्यान किया, वह तो इस जगत में प्रकट हृदयहीन पत्थर के समान है।
धन विद्या गुण और बल, यह न बड़प्पन देत
धन-संपत्ति, उच्च शिक्षा, नाना प्रकार के गुण और शारीरिक या मानसिक बल—ये वस्तुएँ मनुष्य को वास्तविक बड़प्पन (श्रेष्ठता) प्रदान नहीं करतीं। वास्तव में वही...
नारायण प्रीतम निकट सोई पहुँचनहार
नारायण स्वामी जी कहते हैं कि अपने प्रियतम (श्यामसुंदर) के निकट केवल वही पहुँच सकता है, जो अपने अहंकार और मोह रूपी शीश का त्याग कर दे। जो अपने सिर को ख...
बहु विधि पूजा दान व्रत
यदि अहंकार सहित बहुत विधि-विधान से पूजा, दान और व्रत आदि भी किए जाएँ, तो भी बिना दीनता के दीनानाथ (श्री हरि) कभी प्रसन्न नहीं होते।
नारायण सुख भोग में, मस्त सभी संसार
श्री नारायण स्वामी कहते हैं की समस्त संसार विषय सुख भोग में ही डूबा हुआ है, कोई बिरला ही है जो श्री हरि की रूप माधुरी को निहार रहा है।
कपट गाँठि मन में नहीं, सबसों सरल सुभाव
जिस जीव के मन में कपट नहीं है और जो सबके प्रति सरल स्वभाव रखता है, उसी भक्त की नैया पार लगती है; वही भगवद्प्राप्ति का अधिकारी बनता है।
संत जगत में सो सुखी, मैं मेरी को त्याग
संत जगत में वही सुखी है जो “मैं” और “मेरी” का त्याग कर दृढ़तापूर्वक श्री गोविंद के चरणों में अनुराग रखता है।
नारायण हरिकृपाकी, तकत रहै नित बाट
जिस प्रकार डूबता हुआ मनुष्य अंतिम क्षणों में नौका-घाट की ओर आशा भरी दृष्टि से देखता रहता है, उसी प्रकार जीव को भी श्री हरि की कृपा की प्रतीक्षा करते ह...
छबि निहार गोपाल की, जिहिं न होय आनंद
श्री कृष्ण की छवि को निहारकर जिसे आनंद नहीं होता, वह चौथ के चाँद के समान है अर्थात् उसका मुख भी नहीं देखना चाहिए।
देह गेह की सुधि नहीं, टूटि गई जग प्रीत
परम प्रेम की उस अवस्था में अब न तो इस देह (शरीर) का भान रहा है और न ही गेह (घर-संसार) की कोई सुधि रही है। संसार के प्रति जो भी आसक्ति या प्रीति थी, वह...
यह शोभा संसार की, ज्यों टेसू के फूल
यह संसार टेसू के फूल के समान निरर्थक है, जो दिखने में तो अत्यंत सुंदर और चटकीले होते हैं, किंतु उनमें न तो सुगंध होती है और न ही वे फल देते हैं। इसलिए...
नारायण मैं सत्य कहुँ, भुज उठाय के आज
मैं आज अपनी भुजा उठाकर प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि यदि तुम अंतरात्मा से दीन और विनीत बन जाओ, तो दीनों के स्वामी श्री हरि तुम्हें निश्चित ही सुलभ हो जा...
है न्यारो सब पंथ ते प्रेम पंथ अभिराम
संसार के समस्त मार्गों और मत-मतांतरों से प्रेम का यह मार्ग अत्यंत विलक्षण और सुखद है। इस अनुराग के पथ पर अग्रसर होने वाला साधक अति शीघ्र ही अपने प्रिय...
तौलौं यह फांसी गरे
जब तक हृदय में सच्चा प्रेम प्रकट नहीं होता, तब तक वर्णाश्रम धर्म, व्रत और नियमों का बंधन गले की फाँसी के समान बना रहता है। प्रेम के उदय होते ही ये बाह...
नारायण या डगर में, कोउ चलत है बीर
प्रभु के प्रेम-पथ पर चलने वाला कोई विरला साहसी ही होता है, क्योंकि इस मार्ग में प्रत्येक कदम पर मानो बरछी चुभती है और प्रत्येक श्वास में तीर सा वेधन अ...
विधि निषेध श्रुति वेदकी
जिस साधक के हृदय में श्री श्यामा-श्याम के प्रेम की सशक्त चपेट लग जाती है, उसके भीतर वेद और श्रुति द्वारा निर्दिष्ट सभी विधि-निषेध की सीमाएँ स्वतः विली...
वर्णाश्रम उरझे कोऊ विधि निषेध व्रत नेम
कोई वर्णाश्रम धर्म में ही उलझे हुए हैं, कोई विधि-निषेध, व्रत-नियम के चक्करों में उलझकर समय बर्बाद कर रहे हैं, विरले ही वे सौभाग्यशाली हैं जिनके हृदय म...
रूप छके झूमत रहैं, तन को तनक न ज्ञान
जो श्यामा-श्याम के रूप को छक कर झूमता हुआ फिरे, जिसे तन का तनिक भी भान न रहे, और जिसकी आँखें अश्रुधार बहाती हों, वही सच्चे प्रेम की पहचान है।
तनक मान मन में नहीं सब सों राखत प्यार
जिसके ह्रदय में तनिक भी मान की चाह न हो, और सब से प्रेम रखे, ऐसे संतों पर मैं बार बार बलिहार जाता हूँ।
नारायण हरि प्रीति में, जाको तन मन चूर
जिसके ह्रदय में श्री हरि की सच्ची प्रीति होती है उसका तन मन श्री हरि में ऐसा रमा होता है कि उसकी अन्य किसी से ममता नहीं होती चाहे कोई उसके निकट रहे या...
नन्दलाल दशरथ सुवन
नंदलाल श्री कृष्ण एवं दशरथ सुवन श्री राम दोनों एक ही हैं। जो इनको दो कहते हैं वे जीव अज्ञानी हैं। दोनों का एक सा रंग, रूप, तिल एवं चिन्ह आदि हैं अंतर ...
गुण मन्दिर सुंदर युगल मंगल मोदनिधान
युगल सरकार (श्री राधा-कृष्ण) समस्त गुणों के मंदिर हैं और मंगल तथा आनंद के मूल स्रोत हैं। श्री नारायण स्वामी प्रार्थना करते हैं, "हे परम कृपालु युगल वर...
रक्षा करी न जीव की दियो न आदर दान
दिव्य प्रेम रूपी परम धाम की ओर ले जाने वाला यह संकीर्ण पथ अत्यंत कठिन है। इसमें चलने वालों को विश्राम केवल विकलता, मूर्छा या रुदन-सिसकियों के क्षणों म...
प्रेम खेल सबसों कठिन खेलत कोउ सुजान
प्रेम का खेल सबसे कठिन है, जिसे कोई सच्चा सुजान ही खेल सकता है। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जिसने स्वयं भगवद् प्रेम-मार्ग का अनुभव ही नहीं किया, वह...
मन लाग्यो सुख भोग में तरन चहै संसार
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि यदि मन भोग-विलास के सुखों में ही लगा हुआ है, दिन-रात उसी से आसक्ति बनी हुई है और पुन: संसार-सागर से तरना भी चाहे, तो ऐस...
नारायण मन में बसी लोक लाज कुलकान
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि हे मन! तू अभी भी सांसारिक लज्जा और कुल की मर्यादा (मर्यादाओं के बंधन) में फँसा हुआ है। श्री श्यामसुन्दर का प्रेमी (आशि...
नारायण तौ का भयो
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि यदि किसी ने विशाल और आकर्षक नेत्र पा भी लिए, तो उससे क्या लाभ? वे नेत्र तो केवल तभी सार्थक हैं, जब उनमें श्री राधा और श...
मृदु मुसकान निहारि के
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि श्री राधारानी की मधुर मुस्कान का दर्शन कर ऐसा कौन है, जिसे अपने तन की सुधि बनी रहे, जो बौराया न जाए या मौन न हो जाए।
नेहडगर में पग धरै
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि जो प्रेम की डगर पर कदम रखने के बाद भी लोक-लाज और कुल की मर्यादा का विचार करता है, वह वास्तव में सच्चा प्रेमी नहीं है...
तेरे भावे कछु करौ
संसार में जो कोई जैसा चाहे करे, चाहे भला करे चाहे बुरा; हमें न भले का चिंतन करना है न बुरे का। श्री नारायण स्वामी कहते हैं—‘अरे मन! तू बस अपने हृदय रू...
मन में लागि चटपटी
जिस हृदय में श्री कृष्ण दर्शन की वास्तविक लालसा होती है वह स्वतः ही खाना, पीना एवं विश्राम करना भूल जाता है।
मगन रहे नित भजन में
जो जन नित्य ही भजन में उन्मत्त और मग्न रहते हैं, तथा भूल से भी निंदनीय आचरण और कुसंग-वृत्ति नहीं रखते, और किसी के प्रति अपराध नहीं करते—तो जान लीजिए ...
जाके मन में बसि रही
जिसके मन में मोहन की मुस्कान बस जाती है, उसके ऊपर फिर किसी अन्य ज्ञान का प्रभाव नहीं रहता।
नारायण या प्रेम को, नद उमड़त जो ठौर
जिस हृदय में प्रेम रूपी नदी उमड़ पड़ती है, वहाँ एक ही पल में लज्जा एवं मर्यादा रूपी सीमाओं को तोड़ कर आगे निकल जाती है।
दो बातन को भूल मत
यदि जीव अपना कल्याण चाहता है तो उसे दो बातों को कभी नहीं भूलना चाहिए—एक तो मृत्यु को और दूसरा श्रीभगवान को। इन दो बातों का सदा स्मरण रखने से जीव का नि...
चलत फिरत बैठत उठत
श्री नारायण स्वामी बस यही कामना करते हैं कि चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते बस प्रिया-प्रियतम को ही निहारते रहें और श्रीधाम वृन्दावन में वास करें।
नारायण दो बात सों
साधक के लिए दो बातों से बड़ी और कोई बात नहीं है: 1. यदि रसिकों का संग नित्य मिल जाए। 2. रात दिन युगल रूप ध्यान बना रहे।
कोऊ नहीं अपनो सगो
हृदय में इस सत्य को भलीभाँति प्रतिष्ठित कर लो कि श्रीराधा-कृष्ण के अतिरिक्त इस अनंत ब्रह्मांड में तुम्हारा अपना कोई भी नहीं है। यह नश्वर जगत केवल एक ...
प्रेम सहित अँसुवन भरें
ऐसे भक्त अत्यंत दुर्लभ हैं जो प्रेम सहित आँसू बहाकर युगल रूप का ध्यान करते हैं।
नारायण हरि प्रीती में
श्री नारायण स्वामी जी के अनुसार पांच बातें ईश्वर प्राप्ति में बाधक बताई गयी हैं — इंद्रियों के विषयों का भोग, अधिक निद्रा, हँसी-मजाक, संसार के प्रति म...
नारायण जब अंत में, यम पकड़ेंगे बाँह
नारायण स्वामी जी ऐसे जीवों को सावधान करते हुए कहते हैं, “जो अपने सांसारिक कार्यों को भजन से अधिक महत्ता देते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि जब तुम्हारा अं...
जिनको मन हरिपद कमल
जिनका मन श्री हरि के चरण कमलों में, भ्रमर के समान, नित्य प्रति चिपका रहता है, उनका संग करने से जीव को कभी भी हानि नहीं होती।
नारायण दुख सुख उभै
सुख और दुख जीवन में दिन और रात के चक्र की भाँति बिना बुलाए आते-जाते रहते हैं। इसलिए विवेकी मनुष्य को इन दोनों ही परिस्थितियों में समभाव बनाए रखना चाहि...
काम क्रोध मद लोभ की, लगी हिये में आग
यदि मनुष्य के हृदय में काम, क्रोध, मद और लोभ की अग्नि प्रज्वलित हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि उसके भीतर का वैराग्य और ज्ञान दोनों ही नष्ट हो चुके हैं।
नारायण जिनके ह्रदय
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जिनके हृदय में घनश्याम की सच्ची प्रीति लग जाती है, उनके लिए जाति-पाँति, कुल आदि का कुछ भी काम नहीं रह जाता; मानो सब कु...
नारायण तब जानिये
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि सच्ची लगन तभी जानिए, जब हर व्यक्ति, वस्तु एवं जहाँ-जहाँ भी दृष्टि पड़े, वहाँ केवल मोहन लाल ही दिखें।
संत सभा झांकी नहीं
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि तूने न तो संतों की सभा में जाकर उनके दर्शन एवं सत्संग का लाभ लिया और न ही कभी श्री हरि के गुणों का गान किया। फिर हे जीव...
जिनको मन निज वश भयो
जिन्होंने अपने मन से सांसारिक सुखों को विष की भाँति त्याग दिया हो, वे चाहे घर में रहें (संसार में), या बनवास लेकर वन में वास करें, दोनों ही उनके लिए ए...
बहुत गई थोरी रही
अरे मनुष्य! बहुत आयु तो व्यतीत हो चुकी, अब तो थोड़ी ही शेष है। अब भी जाग और नित्य श्री राधा–कृष्ण का भजन कर, क्योंकि कालरूपी चिड़िया निरंतर आयुरूपी खे...
नारायण सुख भोग में
श्री नारायण स्वामी कहते हैं— “अरे धूर्त मन! तू दिन-रात सुख-भोग में ही लगा रहता है; भजन कब करेगा? तेरा अंत-समय निकट है, अपने नैनों को खोलकर देख।”
नारायण सत्संग कर
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि सत्संग (संतों के संग) के द्वारा भजन की रीति सीखनी चाहिए, क्योंकि काम, क्रोध, मद, लोभ आदि में ही आयु व्यतीत होती जा रही...
भयो बावरो प्रेम में
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि यदि किसी जीव को श्री राधा-कृष्ण की प्रेमाभक्ति की लगन लग जाए और वह ब्रज की वीथियों में भाव-विह्वल होकर किसी बावरे की...
रूप रंग सुन्दर घनो
यदि कोई स्त्री अत्यंत सुंदर, रूपवान, चतुर तथा कलाओं की ज्ञाता हो, तथापि यदि वह प्रियतम श्री कृष्ण की भक्ति अथवा उनसे प्रेम नहीं करती, अथवा श्री कृष्ण ...
मान बड़ाई ईर्ष्या
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जिसके मन में मान-प्रतिष्ठा की चाह और ईर्ष्या के अनेक विकार भरे हुए हैं, वह भी बाहर से साधु का भेष धारण किए हुए है—देखो,...
नारायण संसार में
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं—‘भैया, यह संसार क्षणभंगुर है। इस जगत में अनन्त काल से असंख्य राजा होते आए हैं; वे निरन्तर केवल “मैं” और “मेरी” में ही उ...
नन्दलाल कीरति कुंवरि
श्री कृष्ण और श्री राधारानी कहने को तो दो हैं, परन्तु जैसे तन और उसकी छाया सदा साथ रहती है, वैसे ही ये दोनों आधे क्षण के लिए भी अलग नहीं हो सकते।
वृन्दावन जे वास कर
जो सौभाग्यशाली जीव श्री वृन्दावन धाम में वास करते हैं और केवल शाक-पात (साधारण पत्तों और सब्जियों) का ही नित्य आहार करते हैं, उनके ऐसे परम भाग्य को देख...
धनि वृन्दावन धाम है
वृन्दावन धाम धन्य है, “वृन्दावन” नाम धन्य है, और वृन्दावन धाम के वे रसिक जन भी धन्य हैं, जो नित्य श्री राधे–श्याम का सुमिरन करते हैं।
चन्द्रबदन मृग सम नयन
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर हो, नेत्र मृग के समान चंचल और नयनाभिराम हों, चाल गजराज जैसी मतवाली हो और वाणी कोमल एवं मधुर...
जिननें प्रेम प्यालो पियो
जिन जीवों ने युगल-प्रेम का प्याला पिया है, उनके नैन रस में विभोर होकर झूमते रहते हैं। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि वे पूर्ण रूप से छके रहते हैं और ...
नारायण हरि भक्ति की
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि श्री हरि की भक्ति की प्रथम पहचान यही है कि भक्त स्वयं मान-बड़ाई की इच्छा से रहित (अमानी) होकर रहता है और अन्यों को सदैव...
रक्षा करी न जीव की दियो न आदर दान
यदि किसी जीव की न तो रक्षा की और न ही उसे आदर-सत्कार दिया, तो ऐसे पुरुष से श्रेष्ठ तो वह वृक्ष है, जो जीवों को निष्काम भाव से छाया और फल प्रदान करता ...
लतन तरें ठाड़ो कबूं
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि मेरे नैनों में श्यामसुन्दर की वह मूर्ति सदा बसी हुई है—कभी वे वृन्दावन की कुञ्ज-लताओं के मध्य खड़े दिखाई देते हैं, तो क...
प्रेम सहित गदगद गिरा, कढ़त न मुखसों बात
जब भक्त का हृदय प्रेम से भर जाता है, तब उसकी वाणी गद्गद हो जाती है और मुख से शब्द भी नहीं निकलते। उस समय उसे अपने प्रियतम के अतिरिक्त और कुछ नहीं सुहा...
कबूँ हँसै रोवै कबूँ
जिन्हें प्रेम का बाण लग जाता है, उन्हें तन की भी सुधि नहीं रहती; वे कभी हँसते हैं, कभी रोते हैं और कभी अपने प्रेमास्पद का गुणगान करते हुए नृत्य करने ल...
नारायण जाके हिये
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जिसके हृदय में प्रेम की प्रधानता उत्पन्न हो जाती है, वह सबसे पहले हृदय से लोक-लाज और कुल की मर्यादा का मोह ही हर लेती ह...
चार दिनन की चांदनी
इस मानव जीवन-संसार की चाँदनी तो केवल चार दिनों की है, जिसके पश्चात अन्धकार ही अन्धकार है। इसलिए हे मन! तू हरि का भजन कर, जिससे तू इस दुःखमय संसार से प...
विद्या पढ़ करतौ फिरै
विद्या प्राप्त करने के बाद भी यदि हम दूसरों का अपमान करते हैं, तो उसे विद्या नहीं, बल्कि अज्ञान कहा जाता है।
उर भीतर अति चाहना, बाहर राखत त्याग
यदि हृदय के भीतर अनंत चाहें भरी हुई हैं, परंतु केवल बाहरी त्याग रखा हुआ है, तो ऐसा त्याग व्यर्थ है; वह निश्चित ही माया द्वारा परास्त हो जाएगा।
धन यौवन यों जायगो
अरे मन! धन और यौवन ऐसे चले जाएँगे, जैसे कपूर उड़ जाता है। अभी समय है—श्री राधा-कृष्ण का भजन करके अपनी बिगड़ी बना ले; नहीं तो अंत में पछताना पड़ेगा।
निज स्वारथ के मित्र सब
जगत में समस्त व्यक्ति प्रायः स्वार्थवश ही मित्र बनते हैं; परंतु जो बिना स्वार्थ के प्रेम और मित्रता करता है, वह एकमात्र नंदलाल श्रीकृष्ण ही हैं।
रे मन क्यों भटकत फिरत
अरे मन, अनंत कोटि जन्मों से तू क्यों भटक रहा है? अब श्रीकृष्ण का भजन कर। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है; इस बात को समझ और शर...
गुण गावै गोपाल के भरि लावै दृग नीर
गोपाल के गुणों का कीर्तन करते-करते आँखें आँसुओं से भर जानी चाहिए — यही सच्ची भक्ति की पहचान है। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि जब तक बलराम के भैया श्र...
ब्रह्मादिक के भोग सुख
जिसे ब्रजचन्द्र (श्री राधा–कृष्ण) की सच्ची लगन लग जाती है, उसे ब्रह्मा आदि देव के ऐश्वर्य और स्वर्ग के समस्त भोग-विलास भी विष के समान कड़वे और त्याज्य...
बहुत गई थोरी रही, नारायण अब चेत
अरे मनुष्यों बहुत उम्र तो बीत गयी, अब थोड़ी ही बची है, अब तो जाग और नित्य राधा कृष्ण का भजन कर क्यूंकि काल रुपी चिड़िया नित्य ही आयु रुपी खेत चुग रही है...
नारायण हरि प्रीती में
श्री नारायण स्वामी जी के अनुसार पांच बातें ईश्वर प्राप्ति में बाधक बताई गयी हैं जो निम्न प्रकार हैं, सांसारिक विषयों के भोग, निद्रा, व्यर्थ हँसी, जगत ...
नारायण दो बात सों
नारायण दो बात सों, अधिक और नहिं बात | रसिकनको सत्संग नित, युगलध्यान दिनरात || श्री नारायण स्वामी - अनुराग रस (183) साधक के लिए, दो बातों से बड़ी और कोई...
नारायण मन में बसी लोक लाज कुलकान
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि श्री कृष्ण का भक्त होना मजाक नहीं है। उनके भक्तों को पूरी तरह से समाज की लौकिकता, लाज, झूठी प्रतिष्ठा, पैतृक परंपराओं, ...
संत सभा झांकी नहीं, कियो न हरिगुण गान | नारायण फिर कौन विधि, तू चाहत कल्यान ||
यदि संत सभा भी नहीं गए और हरि गुण गान भी नहीं किया तो किस विधि से आप अपना कल्याण चाहते हो ?
नारायण तौ का भयो, पाये नैन विशाल
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि ऐसा क्या हुआ जो किसी ने विशाल सुन्दर नेत्र पा लिए, विशेष नेत्र तो वह हैं जिनमें श्री राधा कृष्ण की नित्य छवि बसती है।
नारायण सुख भोग में, तू लम्पट दिन रैन |
श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि अरे धूर्त मन, तू दिन रात सुख भोग में ही लगा है, कब भजन करेगा? तेरा अंत समय निकट है अपने नैनों को खोल कर देख।
जिनको मन निज वश भयो, तजकर विषै विलास।
जिन्होंने अपने मन से सांसारिक सुख विष की भाँती त्याग दिया हो, वह चाहे घर में रहें (संसार में), या बनवास लेकर वन में वास करें, दोनों ही उनके लिए एक समा...
चलत फिरत बैठत उठत
श्री नारायण स्वामी बस यही कामना करते हैं कि चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते बस प्रिया-प्रियतम को ही निहारते रहें और श्रीधाम वृन्दावन में वास करें।
कोऊ नहीं अपनो सगो, बिन राधा गोपाल
कोऊ नहीं अपनो सगो, बिन राधा गोपाल | नारायण तू वृथा मति, परै जगत के जाल || - श्री नारायण स्वामी - अनुराग रस (50) श्री राधा कृष्ण के सिवाय तुम्हारा अपना...
जिननें प्रेम प्यालो पियो, झूमत तिनके नैन
जिन जीवों ने युगल प्रेम प्याला पिया हो, उनके नैन रस में विभोर झूमते हैं । श्री नारायण स्वामी कहते हैं वह पूर्ण रूप से संतुष्ट (छके) रहते हैं और नित्य ...
नारायण जिनके ह्रदय, प्रीति लगी घन श्याम
श्री नारायण स्वामी कहते हैं जिनके हृदय में घनश्याम की सच्ची प्रीती लग जाए, उनका जात पाँत कुल सब से कुछ भी काम नहीं रह जाता, मानो सब नष्ट हो जाता है |
चन्द्रबदन मृग सम नयन, गति गयंद मृदुबोल
चंद्र के समान बदन, मृग के समान नेत्र, हाथी के समान मस्त चाल हो, और अत्यंत मृदु बोल हों, परन्तु यदि हरि की भक्ति नहीं है तो यह सब संसारी आकर्षण कौड़ी के...
रे मन क्यों भटकत फिरत
अरे मन, अनंत कोटि जन्मों से तू क्यों भटक रहा है, अब श्री कृष्ण का भजन कर। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है, इस बात को समझ और श...
दो बातन को भूल मत
दो बातों को संसार में कभी नहीं भूलना चाहिए यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं—एक तो मृत्यु को और दूसरा भगवान को।
जो घायल हरि दृगन के
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि जो भक्त श्री हरि के नेत्रों की चितवन से घायल हो चुके हैं, वही प्रेम के सागर में डूबते हैं। उनकी दशा अत्यंत अद्भुत हो...
सुख सम्पति धन धामकी
जिनके मन में धन, सुख, सम्पत्ति अथवा धाम की तनिक भी इच्छा नहीं होती, उन्हीं के हृदय में प्रतिदिन, प्रत्येक क्षण प्रेम का प्रकाश होता है।
गढि गढि कें बातें कहे
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि जो जीव बना-बनाकर बड़ी-बड़ी भक्ति अथवा प्रेम की बातें तो बहुत करते हैं, परंतु उनके मन में लेशमात्र भी वास्तविक प्रेम ...
नारायण अति कठिन है
श्री नारायण स्वामी जी कहते हैं कि श्री हरि से मिलने का मार्ग अत्यंत दुर्गम और कठिन है। इस प्रेम-मार्ग पर कोई साधक तभी अपने कदम रख सकता है, जब वह सर्वप...
लखी न जिन छबि श्याम की
जिस ने पल भर के लिए भी श्याम सुंदर की छवि न निहारी, और न ही पल भर के लिए ध्यान किया, वो तो जगत में प्रगट हृदय हीन पत्थर के समान हैं।
सुनत न काहू की कही
न तो मैं किसी को सुनता हूँ, न ही मैं किसी से कुछ भी कहता हूँ। श्री नारायण स्वामी कहते हैं, मेरा मन रात दिन श्री राधा कृष्ण की रूप माधुरी में पूर्ण रूप...
प्रेम सहित अँसुवन भरें
ऐसे भक्त अत्यंत दुर्लभ हैं जो प्रेम सहित आँसू बहाकर युगल रूप का ध्यान करते हैं।
नारायण हरि भक्ति की, प्रथम यही पहचाँन
सबसे पहली पहचान भक्ति की यही है कि वह स्वयं मान नहीं चाहता और दूसरों को मान देता है।
नारायण तब जानिये, लगन लगी या काल
श्री नारायण स्वामी कहते हैं की सच्ची लगन तभी जानिये जब हर व्यक्ति, वस्तु एवं जहाँ जहाँ भी दृष्टि पड़े, केवल मोहन लाल ही दीखें |
नारायण जाके हृदय
जिसके हृदय में श्यामसुन्दर समा जाते हैं, उसे फूलों, पत्तियों, फलों और वृक्षों की डारों में—अर्थात् हर जगह—श्यामसुन्दर ही दिखाई देते हैं।