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Sacred Scripture

हृदय सर्वस्व

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

30 items
general

नाहिं लोक सों लाज है, नाहिं वेद सों काज

अब न तो मुझे लोक-मर्यादा की कोई लज्जा है और न ही वेदों के विधान से मेरा कोई प्रयोजन रह गया है। मेरा एकमात्र सम्बन्ध तो केवल श्री राधा महारानी जू से है...

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नरक पड़न आछो लगे कुमरि चरण के हेत

हे किशोरी जी (श्री राधा)! आपके श्री चरणों के सानिध्य के लिए मुझे नरक में गिरना भी स्वीकार्य (अच्छा) है, किंतु उन श्रीचरणों के बिना मुझे स्वर्ग या सुंद...

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सेव्य सदा श्रीराधिका सेवक नन्द कुमार

श्री वृन्दावन के सुंदर नित्य विहार में श्री राधिका ही सदा सेव्य हैं; और श्री श्यामसुंदर तथा सहचरियाँ उनकी नित्य सेवक हैं।

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रुचिर धाम वृंदाविपिन पुर वृषभान उदार

श्री वृन्दावन धाम परम सुंदर और रुचिकर है एवं बरसाना धाम परम उदार है जहाँ (बरसाना में) श्री गह्वर वन में श्री राधा-कृष्ण का नित्य विहार चलता रहता है।

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राधा नाम रटे जोई, तासों मेरो संग

जो नित्य राधा-नाम को रटते हैं, उन्हीं के साथ मेरा सच्चा संग है। मेरी अविचल रति और अनन्य प्रीति केवल श्री राधा के चरणों में ही स्थित है।

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राधा जीभ रटों सदा

मेरी जिह्वा सदा “राधा” रटती है, मेरे कान सदा “राधा” सुनते हैं। मेरे नयन सदा श्री राधा को ही देखते हैं; श्री राधा के अतिरिक्त मेरी कोई गति नहीं है।

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जे जे राधा नाम कौं, भजत जगत में जान

जो भी इस संसार में श्री राधा-नाम का भजन करते हैं, वे सब मुझे अपने प्राणों के समान प्रिय लगते हैं।

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श्री हरिवंश स्वरूप हैं श्रीहरिदास उदार

श्री वंशी अलि जी के अनुसार श्री हरिवंश एवं श्री हरिदास दोनों एक ही स्वरूप हैं, जिन्होंने प्रिया-प्रियतम के निज महल के नित्य विहार रस का ही वर्णन किया ...

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जलबिहार ते आदि सुष, सषियन के ही हेत

श्री राधा विविध लीलाएँ, जैसे जल-विहार आदि, अपनी सखियों के आनंद के लिए करती हैं। प्रत्येक सखी अपने विशिष्ट भाव के अनुसार उस लीला-रस का आस्वादन करती है।

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श्री राधा मेरे प्रान धन

श्री राधा ही मेरा प्राण धन है, श्री राधा ही मेरा जीवन है एवं श्री राधा की गौर वर्ण की छवि ही मेरी आँखों में नित्य समाई हुई है।

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लाल नैंन में कुंवरि है, कुंवरि चरण में लाल

श्री कृष्ण के नैनों में राधिका रहती हैं, श्री राधा के चरणों में श्री कृष्ण रहते हैं, और श्री ललिता जी के हृदय में दोनों राधा-कृष्ण सदा रहते हैं, जिनका...

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लालन सोई प्रिया पद गुरु सोई प्रिया उपास

मैं उन श्री लाल जी (श्री कृष्ण) को ही जानता हूँ जो श्री राधा के चरणों के अनन्य दास हैं, और उन गुरुदेव को ही जानता हूँ जो श्री राधा की अनन्य उपासना करे...

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राधा चेरी हों सखी मेरे मन नहिं आन

हे सखी, मैं श्री राधा की ही अनन्य दासी हूँ, मेरे मन में श्री राधा के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। श्री वंशी अलि जी कहते हैं कि श्री राधा के निज जन की सब...

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नयन ही में नयन रहें हिय में हियो समाय

श्री राधा के नयनों से श्री कृष्ण के नयन मिलते रहें, ह्रदय में ह्रदय समाया हो, भुजाओं से भुजाएँ लिपटी हों—बस यही (नित्य विहार) रस ह्रदय को भाता है।

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श्री ललिता हरिवंश वपु

श्री वंशी अलि जी के अनुसार स्वयं श्री ललिता जी ही श्री हित हरिवंश के स्वरूप में कुँवरि श्री राधा की चरण माधुरी को विश्व में प्रकाशित करने हेतु इस धरा ...

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कुंवर लली वृषभान की मेरे जीवन प्रान

श्री वृषभानु कुँवरी श्री राधा ही मेरे जीवन की प्राण हैं। मैं इस वृंदावन धाम की शपथ ग्रहण कर कहता हूँ कि उनके अतिरिक्त मेरे ह्रदय में अन्य कोई नहीं निव...

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नरक परन आछो लगे कुंवरि चरन के हेत

यदि श्री राधा के चरणों का संग प्राप्त हो, तो नरक का वास भी मुझे प्रिय होगा। परंतु उनके चरणों के बिना, चाहे मुझे सुंदर निकुंज का वास ही क्यों न मिल जा...

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नैनन नासिका राधिका

मेरे नयन, नासिका एवं सभी अंग राधिका हैं, श्री राधा ही मेरे हृदय और वचनों में संपूर्ण रूप से विराजती हैं। ऐसा अब मेरा सहज स्वभाव बन चुका है कि मैं श्री...

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राधा ही के भजन से पाऊँ राधा बाल

श्री राधा का अनन्य भजन करके ही श्री राधा को प्राप्त किया जा सकता है जिसके पश्चात् वे नित्य ही हंस हंस कर निहारती हैं एवं निहाल करती रहती हैं।

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नाहीं और रस की तहाँ खटक कहूँ दिन रात

इस एकांतिक निज महल के रस में प्रिया प्रियतम को रात-दिन नित्य विहार के अतिरिक्त अन्य कोई रस नहीं भाता। यहाँ प्यारी राधिका रस माधुरी से श्री कृष्ण का पो...

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राधा अंग सिंगार हौं, जावक दैहौं पाँव

श्री राधा के अंगों को श्रृंगार कर, उनके चरणों में जावक लगाती हूँ। कभी कभी श्री राधा से ही प्रेमपूर्वक झगड़ा भी करती हूँ क्योंकि उनके अतिरिक्त मेरी और ...

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हौं रूसोंगी कुँवरि सों, कुँवरि मनावै मोहि

मैं कुँवरि (श्री राधा) से प्रेमपूर्वक रूठ जाऊँ, तो श्री राधा ही मुझे मनाएँगी। परंतु यदि कभी श्री राधा मुझसे रूठ जाएँ, तो मैं उनके चरणों में गिरकर उन्ह...

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गहि गहि राधा कर कमल झूमक नाचौं नाच

श्री राधा के कोमल, कमल-से हाथों को बार-बार थामकर, झूमते हुए नाचूँ और चरणकमलों को सच्चे (शुद्ध) मन से अपने नेत्रों से लगाऊँ।

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श्री वृषभान कुमार नित नाम कुँवर नंदनन्द

श्रीवृषभानु-कुमारी श्रीराधा एवं नन्दनन्दन श्रीकृष्ण सदा नित्य-विहार-रस में निमग्न रहते हैं और अपनी सखियों के हृदयों को आनन्दरस में अभिषिक्त करते रहते ...

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हौं कहि हों नाहिंन कछू पोढ़ी कुंवर सुखरास

सुख की राशि किशोरी जब पौढ़ी होंगी, मैं कुछ भी नहीं बोलूँगा, उनको निहार-निहार कर मेरे ह्रदय में उनके मुख दर्शन की प्यास और-और बढ़ेगी।

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मोसों हँसि हो लाडिली हौं हँसिंहों तेहि सँग

मेरे साथ श्रीलाड़िलीजी (राधा) हँसती-खेलती हैं और मैं भी उनके साथ हँसती हूँ। जब वे प्रेम में भरकर मुझे गुदगुदी करके हँसाती हैं, तब मैं भी उनके अंगों को...

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बेटी श्री वृषभानु की मेरी जीवन प्राण

श्री वृषभानु नंदिनी, श्री राधा ही मेरी जीवन-प्राण हैं। मैं इस पावन वनभूमि (श्री वृन्दावन) की सौगंध खाकर कहता हूँ कि उनके सिवा मेरा कोई और आश्रय या गति...

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ईश्वर ताई कुंवरि मै

श्री धाम वृंदावन के नित्य विहार में ईश्वरत्व श्री राधा में है और दासत्व श्री कृष्ण में है। श्री राधा सदा अपनी कृपा दृष्टि डालकर श्री कृष्ण को निहाल क...

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राधा पलिका पौढ़ि है बैठि पलोटों पाइ

जब श्री राधा अपने पलंग पर शयन कर रही होंगी, तो वहीं पास में बैठकर उनके चरणों को प्रेमपूर्वक दबाऊँगी। नेत्रों से अश्रु प्रवाहित करते हुए, श्री राधा के ...

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हंस हंस कंठ लगाय है मोको मेरी जीव

मेरी प्राणप्यारी, श्री लाड़ली प्यारी जू (श्री राधा), मुझ पर अपनी अनंत करुणा बरसाते हुए हँस-हँस कर मुझे बार बार गले से लगाती हैं और अपने अमृततुल्य खंडि...