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Sacred Scripture

मन शिक्षा

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

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ब्रजमण्डल वृंदावन मैं फिरी सफल किए नहिं पाय

यदि ब्रजमण्डल एवं वृंदावन में भ्रमण कर भी अपना जीवन सफल न बनाया, तो मानो यह दुर्लभ मानव-जीवन पाकर भी मूर्खता-वश नष्ट कर दिया।

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रतिं गौरीलीले अपि तपति सौन्दर्यकिरणैः

हे मन! जो अपनी सौन्दर्य-किरणों से रति, गौरी एवं लीला को सन्तप्त करने वाली हैं, सौभाग्य समूह से जो इन्द्राणी, लक्ष्मी तथा सत्यभामा को पराजित करने वाली ...

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याही तैं, रसिकन की बानी, गहि तू तत्त्व छनी है

रसिकों की वाणी परम तत्त्व का सार है, क्योंकि उसमें श्री श्यामाश्याम का नित्य निवास है। श्री किशोरी जी के चरणों की शरण को छोड़कर भटकने में क्या लाभ होगा...

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वृंदावन बसि, वृंदावन बसि, वृंदावन सुखदाई रे

वृन्दावन में बसना ही परम सुखदायी है क्योंकि यह वृन्दावन ही सब प्रकार से सुख देने वाला है जहाँ हमारे लाड़ले दम्पति (श्री राधा-कृष्ण) सदैव अखंड रूप से वि...

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रसिक जननि कौ संग मनोहर

श्री किशोरी अलि जी पुकार कहते हैं कि रसिकों का संग अत्यंत मनोहर और कल्याणकारी है; जो साधक उनके संग में रहकर उनकी वाणी का मनन करता है, उस पर श्री प्रिय...

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यथा दुष्टत्वं मे

अरे मन! तू इस श्रीब्रज धाम में ऐसी दीनतामय व्याकुलता से श्रीगिरिधारी जी [श्री कृष्ण] का भजन कर, जिससे वे कृपा करके मुझ जैसे शठ का भी दुष्ट स्वभाव दूर ...

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वृन्दावन, वृन्दावन, वृन्दावन कहि रे

हे जीव! "वृंदावन वृंदावन वृंदावन" कह, और श्री वृंदावन धाम की शरण शीघ्र ग्रहण कर। [1] अपनी सांसारिक कामनाओं की पूर्ति हेतु क्यों तू देश देश भटक रहा है...