सन्तग्रन्थरागश्लोकस्तोत्रकविता
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करि मन वृन्दावन सों हेत

“ करि मन वृन्दावन सों हेत, निसि दिन छिन छाया जिनि छाड़हिं, रसिकन कौ रस खेत । " - श्री हरिराम व्यास (व्यास वाणी), पूर्वार्ध (91) अरे मन तू वृन्दावन स...

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प्यारी श्री वृन्दावन की रैनु

वृंदावन की रज बहुत प्यारी है, श्री कृष्ण इसी वृंदावन की रज को नित्य ही निहारते रहते हैं और प्रसन्न होकर वह बांसुरी बजाते हैं। यह वह रज है जिसमें श्री...

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ऐसो कब करिहौ मन मेरौ

हे मन, ऐसा कब होगा जब तू रसिक संतों का दासत्व स्वीकार करेगा और श्री वृंदावन में रहेगा ?

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तन अवही कौ कामै आयो

श्री हरिराम व्यास (श्री विशाखा सखी अवतार ) के शब्दों में, मेरा तन जो आज काम आया है धन्य है। धन्य है जो इसने साधु चरणों का संग किया जिसके परिणाम स्वरुप...