ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
6 itemsहमरे सुख कौ वपु बन्यौ
नित्य निभृत निकुंज में अपने प्राणप्रियतम श्री कुंजविहारी के संग नित्य केलि-विहार करने वाली रसस्वरूपा कुंजविहारिणी लाड़िली हमारे सुख का ही स्वरूप बनी ह...
मन सीसी राधा अतर
मेरे मन-रूपी शीशी में श्री राधा-रूपी इत्र नख-शिख तक भरा हुआ है। उसे देखकर साँवरे श्री कृष्ण भँवरे के समान मोहित होकर उससे लिपटे रहते हैं।
पुरुष भाव छूटै नहीं, मन में बस रही जोई
सखी भाव एक दिव्य भाव है जिसका प्रादुर्भाव बिना निर्विकार हुए नहीं होता, जहाँ जीव लौकिक कर्मों एवं संबंधों से सर्वप्रथम अनासक्त हो जाता है, जहाँ वह न त...
रसिक रसीली बात सों
जब श्री राधा विहार-लीला में मान धारण करती हैं, तब रसिकवर श्री लाल जी उनकी ओर मुख कर, मधुर एवं रसीली बातों से उन्हें मनाने का प्रयास करते हैं और नयनों ...
प्रिया आसिक मासूक हम
श्री ललित किशोरी जी कहती हैं कि श्री प्रियाजी से हमारा ऐसा घनिष्ठ संबंध है कि वे हमारी आशिक (प्रेमी) हैं और हम उनके माशूक (प्रेम-पात्र) हैं। वे हमें प...
श्री कुंजबिहारिणी लाड़ली
वृन्दावन की कुंजों में विहार करने वाली हे श्री प्यारी जू! आप अत्यंत उदार और दयालु हैं। आप श्रीकृष्ण को भी संतुष्ट एवं पोषित करती हैं, क्योंकि उस दिव्य...