ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
8 itemsप्यारी जू सुंदर वदन
हे प्यारी जू [श्री राधा] आपका रूप सौंदर्य अत्यंत सुंदर एवं मनोरम है। इस रूप को निहार निहार कर प्रीतम [श्री कृष्ण] अत्यंत सुख का अनुभव करते हैं, एवं ए...
प्यारी तेरे तन की सोभा बरनी न जाइ
हे प्यारी जू, आपके अंग की शोभा अवर्णनीय है, क्यूंकि आपके जिस अंग का दर्शन मेरी आंखें करती हैं, वहीँ पर लुभायमान होकर अपलक टिक जाती हैं। [1] श्री बिहा...
नवल वृन्दावन नवल बसंत
श्री बिहारिन देव जी के शब्दों में नित्य ही नया वृन्दावन है, नयी बसंत है, नित्य नया युगल वृन्दावन रस है , नित्य नया आनंद है और अनंत काल तक इसका अंत नह...
ऐसी स्वामिनी साहिबिनी
श्री बिहारिन देव के शब्दों में स्वामिनी श्री राधारानी अत्यन्त उदार हैं एवं रसिक अनन्य की नित्य सहायता करने वाली हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि म...
तहाँ नहीं कछु श्रम
तहाँ नहीं कछु श्रम तम न ग़म विरह भ्रम मान लवलेश प्रवेश न प्रसंगी। - श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (160) अखंड नित्य विह...
जा रज सौं जग रज कहै
प्रायः जीव संसारी माया की तलाश में कहाँ-कहाँ जाता है और दिन-रात प्रयत्न करता है, एवं माया-रूपी रज का ही सेवन करता है जो अहंकार को पुष्ट करती है। परन्त...
नवल वृन्दावन नवल बसंत
श्री बिहारिन देव जी के शब्दों में नित्य ही नया वृन्दावन है, नयी बसंत है, नित्य नया युगल वृन्दावन रस है , नित्य नया आनंद है और अनंत काल तक इसका अंत नही...
ऐसी स्वामिनी साहिबिनी
श्री बिहारिन देव के शब्दों में स्वामिनी श्री राधारानी अत्यन्त उदार हैं एवं रसिक अनन्य की नित्य सहायता करने वाली हैं। श्री बिहारिन देव जी कहते हैं कि म...