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ग्रन्थ के पद एवं श्लोक
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पौंढे माई लालन गिरिवरधारी
हे सखी, कुंज-महल के भीतर पुष्पों से सुसज्जित सुंदर सेज पर लाल गिरिधारी श्री कृष्ण पौढ़े हैं, और उनके साथ श्री राधिका प्यारी की मनोहर छवि शोभा बढ़ा रही...
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आगें कृष्ण, पाछें कृष्ण, इत कृष्ण उत कृष्ण
श्री कृष्ण आगे हैं, श्री कृष्ण पीछे हैं, श्री कृष्ण इधर हैं, श्री कृष्ण उधर हैं, जहाँ भी मैं देखता हूँ, वहाँ केवल श्री कृष्ण ही दिखते हैं। [1] मोरपंख...
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धाइके जाइ जी जमुना-तीरे
दौड़कर यमुना के तट पर चलो। उसकी महिमा कहाँ तक वर्णित की जा सकती है? यमुना जी के नीर का स्पर्श करते ही हृदय प्रेम से सराबोर हो जाता है। [1] मनमोहन श्र...