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Sacred Scripture

श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी

ग्रन्थ के पद एवं श्लोक

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सुखद वृंदावन सुखद यमुना तट

श्री वृन्दावन सुखमय है, श्री यमुना तट सुखमय है एवं वहाँ के कुञ्ज भवन सुखमय है जहाँ हिंडोरा की रचना हुई है। लता-पता सुखमय है, फल-फूल सुखमय है, बहती हुई...

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देखोऊ प्यारी कुंजबिहारी मूरति

हे सखी, बसंत के इस मौसम में श्री कुंजबिहारी को मूर्ति की भाँति अर्थात् अहर्निश निहार। उनके तरुण एवं नित्य नवीन तन से रस की वर्षा हो रही है। [1] श्री ...

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सखी, हौं स्‍याम रंग रँगी

हे सखी मैं श्यामसुंदर के रंग में रंगी हूं। श्री श्याम सुंदर के सुंदर स्वरूप को निहार कर मैं बिक चुकी हूँ, और उसकी रूप माधुरी में सराबोर हो चुकी हूँ। [...

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मेरे कलिकल्मष कुल नासे

श्री यमुना जी का दर्शन, समस्त कलि कल्मषों का निवारक है। [1] समस्त प्रकार के दोष इस प्रकार बह जाते हैं जैसे सिंह को देख कर हिरणों का समूह भाग जाता है।...

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नंद-कुल-चंद, वृषभानु-कुल कौमुदी

श्री वृंदावन रूपी विमल आकाश में नंद कुल के चंद्र (श्री कृष्ण) एवं वृषभानु कुल की पूर्ण चाँदनी (श्री राधा) उदित हुए हैं। [1] उनके निकट स्थित सखीवृन्द ...

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यह सुख जो हृदय रहे

जब श्री प्रिया-प्रियतम का वृंदावन रस हृदय में रहता है, तब वह हृदय की समस्त मलिनताओं एवं विकारों को स्वतः ही भस्म कर देता है, जिसके फलस्वरूप चित्त इधर-...

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अंग अंग प्रेम बरखत, सकल सुखकी मूरि

जिनके अंग अंग से प्रेम बरसता है, वे ही समस्त सुखों की मूल हैं। श्री गदाधर भट्ट जी ऐसी श्री राधा के चरणों की रज को अपने सिर पर सदा रखते हैं।

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देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी

अरी सखी! देखो, ब्रज की हर एक गली में आनंद के सागर स्वयं हरि, प्रेमपूर्वक होली खेल रहे हैं। मधुर गीतों, हास-परिहास और लीलाओं के मध्य, हजारों सखाओं के स...

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है हरि तें हरिनाम बड़ेरो

भगवान हरि से भी बड़ा उनका ‘नाम’ है; हे मूर्ख! तू इस सत्य को स्वीकार करने में संकोच क्यों करता है? इसका प्रमाण देख—मुचकुंद को भगवान ने साक्षात् दर्शन द...

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अंग संग सो प्रेम बरखत सकल सुख की मूरि

श्री गदाधर भट्ट जी कहते हैं कि जिनके अंग-संग से साक्षात प्रेम की ही वर्षा होती है, जो समस्त सुखों की आधार हैं, ऐसी श्री राधे जू की चरण-रज मैं अपने सिर...